Sunday, 22 February 2015

एक बेटे की कहानी...



घर का बेटा सभी कार्यों को अंजाम देता है. बाहर जा कर काम करता है, घर परिवार को संभालता है, दूसरे शब्दों में बेटा घर का उत्तराधिकारी होता है. लेकिन फिर हजारों में कई बार कुछ ऐसे भी नगीने मिल जातें है, जिन्हें देख लगता है कि, जरुरी नहीं है उत्तराधिकारी कोई लड़का ही हो. पूणे में रहने वाली माधुरी प्रभु की तो यही दास्तान है...

Madhuri Prabhu

माधुरी प्रभु पिछले आठ से ज्यादा सालों से प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन (पि.आई.एफ़) के साथ कार्य कर रहीं है. जब माधुरी पि.आई.एफ़ में बतौर टीचर (संचारक) नियुक्त हुई तब से लेकर आज तक उन्होंने कई पड़ाव पार कर टीम लीडर का पदभार संभाल रहीं है. आठ साल!!! एक बहुत ही लंबा कार्यकाल होता है... ज़ाहिर सी बात है, की कुछ न कुछ तो ऐसी वजह तो होगी जिसके कारण, माधुरी ने अब तक यहाँ से कहीं और जाने का मन नहीं बनाया.

माधुरी बताती है की जब उन्होंने पि.आई.एफ़ के साथ कार्य करना शुरू किया था, तब से लेकर अब तक उन्होंने बहुत कुछ सीखा है, यहाँ सब अपने लगतें है. पहले लोगों के सामने बोलने में डर लगता था, किसके साथ कैसी बात करना चाहिए पता नहीं था, और भी कई ऐसी बातें थी जो नहीं आती थी लेकिन यहाँ कार्य करने के बाद धीरे- धीरे वो सभी बाते समझ में आने लगी, और आज बिना किसी की डर के लोगों से अलग अलग कंपनियों, डोनर से बात कर सकती है, खुद को व्यक्त कर सकती है.

माधुरी को शुरुआत में ऐसा लगता जरुर था की किसी बैंक में जॉब करना चाहिए, और उसके लिए कई बार प्रयत्न भी किए गए, कई बैंक परीक्षाओं में उत्तीर्ण भी हुई, लेकिन कहतें है न कि “जो भी होता है मंजूरे खुदा होता है”. माधुरी को बैंकिंग में नहीं बल्कि एजुकेशन सेक्टर में कार्य मिला, और आज उन्हें आठ साल पूरे हो चुकें है.

वैसे, माधुरी के कार्यकाल की शुरुआत 10वी में पढ़ाई करते करते हुई. घर में माता-पिता और एक छोटा भाई था. माधुरी ने पहला कार्य मेडिकल स्टोर से शुरू किया, तब शुरूआती दौर में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था. खैर; गलती माधुरी की नहीं थी, डॉक्टरों की लिपि ही ऐसी होती है की कई महारथी समझ नहीं पाते. लेकिन “जब बुलंद हों हौसले तो गहराईयों से क्या डरना” माधुरी ने कार्य करने की ठान ही ली थी तो, धीरे धीरे यह सब समझ में आने लगा, और दो साल सफलता पूर्ण कार्य करने के बाद उन्होंने कॉलेज की शुरुआत करने से पूर्व यह कार्य छोड़ दिया. यही समय था जब कम उम्र में ही माधुरी ने अपने घर, पढाई और कार्य के बीच नियोजन करना सीखा.

जब वो ग्रेजुएशन के लिए कॉलेज गई, तो उनके लिए एक नया रास्ता और खुलता नज़र आया वो रास्ता जा रहा था शिक्षा की ओर. ऐसे में सुबह कॉलेज और शाम के बचे हुये समय में टीचिंग करना शुरू किया, और फिर पि.आई.एफ़ के साथ कार्य करते करते माधुरी आज टीम को संभालती है. माधुरी यह सब याद करते हुए बताती है की अगर मुझे पि.आई.एफ़ द्वारा प्रोत्साहन नहीं मिला होता तो शायद वो यह सब नहीं कर पाती. लेकिन मेरा ऐसा मानना है की पि.आई.एफ़ द्वारा एक मंच तैयार किया गया था, लेकिन अगर आप मेहनत नहीं करती तो आपको यह मुकाम नहीं मिल पाता...

लेकिन क्या आपके मन में यह सवाल नहीं उठा रहा है कि माधुरी को 10वी कक्षा से कार्य करने की जरूरत क्यों महसूस होने लगी? खेलने कूदने की उम्र में कार्य करने की क्या जरुरत थी? कारण था पारिवारिक और सामाजिक परिस्थिति का अनुकूल न होना. परिवार बहुत ही नाजुक हालातों में था, पिता एम्.आई.डी.सी में वेल्डर का कार्य करते थे, और माँ भी प्रथम के साथ बतौर टीचर कार्यरत थी. उस वक़्त जो कुछ भी पैसा आता था, वो पूरा नहीं हो पता था. एक कहावत याद आती है, कहतें है की “गरीबी में गीला आंटा”, पिता कैंसर रोग से पीड़ित थे, जिसके चलते माँ को कार्य छोड़ना पड़ा, माता और पिता दोनों की कमाई बंद हो गई. धीरे धीरे जो कुछ भी थोड़ी बहुत सेविंग्स थी वो ख़त्म होना शुरू हो गई. ऐसे में घर में सिर्फ माधुरी का ही सहारा था, क्योंकि छोटा भाई उस लायक था नहीं की किसी तरह का कार्य कर सकें. माधुरी ने बहुत ही बहादुरी से इस बात की जवाबदारी ली और कार्य करना शुरू किया. लेकिन परिस्थिति बिगड़ती गई, क्योकि काम तो करना ही था, पिता का इलाज भी करवाना ही था, मानसिक रूप से काफी परेशान तो थी ही, ऐसे में समाज का दबावों के चलते और भी समस्याए सामने आने लगी.

जवान लड़की दरअसल बच्ची घर से बाहर काम करने जा रही है. यह समाज को गवारां नहीं था. कहने को रिश्तेदार और दोस्त तो थे लेकिन जब जरूरत आई, तो आसपास कोई नज़र नहीं आया. क्या माधुरी और उनके परिवार को रिश्तेदारों या दोस्तों से पैसों की उम्मीद थी? नहीं, बस एक उम्मीद थी, वो भी इतनी सी की, काश कोई परिवार के साथ बैठ कर हौसलाअफजाई कर सकें. “आसमान में लाखों तारे, एक मगर ढूंढे न मिला”. मैं दरअसल कभी कभी सोचता हूँ, की कैसे काटें होंगे वो दिन, वो पल, जो कुछ भी उनके परिवार में घट रहा था.

खैर कमाना तो जरुरी था, तो कार्य करना शुरू भी कर दिया, उस वक़्त फ़रिश्ते की तरह पि.आई.एफ़ द्वारा पिता के इलाज के लिए कुछ पैसों की व्यवस्था की गई, लेकिन बावजूद इसके पिता बच न सकें. आज़ वो उस मुकाम पर है जहाँ वो घर को खुद संभालती है. अगर अटल इरादें हो तो रास्तें खुद बा खुद खुलने लगते है, अब आप ही मुझे बताये क्या माधुरी कोई बेटे से कम है?                                                                               
                                                                                                                                   -    विशुल ब्राउन