Monday, 25 May 2015

इन सब चीज़ों से मुझे सुकून मिलता है - तनिष्का रेडीज

Tanishka Redij

तनिष्का जब मुझे उनके, बीते कल की कहानी बता रही थी, तब मेरे मन में एक दूसरी ही कहानी चल रही थी; ठीक इसी तरह की. मशहूर फिल्म डांस डायरेक्टर फराह खान जिनके पिता भी फिल्मों से ही संबंध सखते थे, बहुत छोटी सी उम्र में पिता ने सब कुछ गंवा दिया था, फराह ने भी अपना बचपना बेहद संघर्षों में गुजारा है. लेकिन मेहनत उनके रगों में थी और इसलिए आज वो उस जगह पर है जो उन्होंने निर्धारित की थी. तनिष्का का संघर्ष भी कोई कम नहीं था, गिरना और फिर संभालना यही सबक मुझे फराह और तनिष्का की इस कहानी में दिखाई देता है.

तनिष्का रेडीज का बचपना दक्षिण मुंबई से जुड़ा हुआ है, ठीक विक्टोरिया टर्मिनस (आज का छत्रपती शिवाजी टर्मिनस) के सामने उनके पिता का एक छोटा सा व्यवसाय हुआ करता था. यह बात 1984 के आसपास की है जब तनिष्का महज़ 6 या 7 साल की थी. अचानक कुछ ऐसी परिस्थिति पैदा होना शुरू हो गई, जिसके चलते पिता का व्यवसाय बंद हो गया. न चाहते हुए भी माँ, तनिष्का और उनके दो भाई को रत्नागिरी के चिपलून गाँव में, स्थलांतर करना पड़ा. बेहद कठिन फैसला था क्योंकि परिवार को गाँव में रख कर, किसी और के व्यवसाय को संभालना और पालन पोषण करना आसान नहीं था. तनिष्का बताती है कि “मेरी पहली तक की शिक्षा मुंबई में ही पूरी हुई थी, लेकिन व्यवसाय बंद होने से परिस्थिति पूरी तरह बिगड़ गई थी. दैनिक जरूरतों के लिए पैसे नहीं थे, ऐसे में पिता को यह फैसला लेना ही पड़ा की, हम चारों चिपलून में रहें, और वो मुंबई में ही कार्य कर परिवार को सहयोग कर सकें.”

आर्थिक परिस्थिति पूरी तरह डगमगा चुकी थी, लेकिन पिता के हौसलेबुलंद थे. न तो पिता ने हार मानी थी और न बच्चों ने. बस समय की मार के चलते परिवार लड़खड़ा रहा था. तनिष्का ने गाँव के ही एक स्कूल में दाखिला ले लिया था, और पढ़ाई की ललक तनिष्का को शुरू से ही थी. तनिष्का को न केवल पढ़ाई में बल्कि खेल कूद, चित्रकला, रंगोली, वक्तृत्व कला आदि विषयों में भी काफी दिलचस्पी थी. जिसके चलते तनिष्का शाला ने सबकी आँखों का तारा बन गई. लेकिन पिता की अकेली कमाई पर घर मुश्किल था. ऐसे में तनिष्का ने 12वी तक किसी तरह अपना अध्यन पूरा किया. लेकिन जब उच्च शिक्षा के लिए पैसों की कमी आई तब तनिष्का ने गाँव में ही बच्चों को पढ़ाने का कार्य शुरू कर दिया था. जो भी कमाई होती, वो अपने कॉलेज की फीस के लिए जमा करती थी. इससे न केवल तनिष्का को बल्कि पिता को भी सहायता मिलनी शुरू हो गई. तनिष्का ने एम् ए करना शुरू किया और साथ ही साथ वो बच्चों को घर में पढ़ाने का कार्य भी करती थी. “यही वो समय था जब जब मुझे टीचिंग में दिलचस्पी मिलने लगी बच्चों को पढ़ते देख मुझे ख़ुशी होती थी, और मैंने सोच लिया की आगे जा कर मुझे भी टीचर ही बनना है.”

एम् ए के ख़तम होते ही, तनिष्का को शासकीय कॉलेज से डी’एड की शिक्षा के लिए एक पत्र आया, लेकिन फीस बहुत ज्यादा होने के कारण वो यह कोर्स कर नहीं पाई. “मुझे डी’एड करना था, लेकिन परिस्थिति ने करने नहीं दिया.” कॉलेज ख़त्म करने के पश्चात् तनिष्का ने जॉब करने के लिए दोबारा मुंबई का रुख किया. तब उन्होंने टीचिंग के अलावा और भी द्वार खुले रखे थे. ऐसे में पहली जॉब एक ब्यूटी पार्लर में की, जिसके लिए उन्होंने बाकायदा प्रशिक्षण लिया. तीन महीनों के बाद तनिष्का ने यह कार्य छोड़ कर, एक प्राइवेट कंपनी में बतौर अकाउंटेंट का कार्य करना शुरू किया. जैसे ही तनिष्का ने यहाँ कार्य की शुरुआत की वैसे ही कुछ समय में तनिष्का ने वैवाहिक जीवन में प्रवेश किया, इसके बाद कुछ समय का अल्पविराम लेकर मुंबई के मशहूर सरकारी चिकित्सालय में बतौर क्लर्क, उन्होंने सेवा देनी शुरू की, लेकिन कुछ समय बाद गर्भावस्था के चलते उन्होंने यहाँ से छोड़ दिया. “शादी के पहले तक मेरी आर्थिक परिस्थिति नाजुक ही थी, लेकिन शादी के बाद स्थिति बदलने लगी थी. लेकिन कार्य करने की इच्छा मुझ में अभी तक थी.”

Tanishka with her husband

काफी समय निकल चूका था, बच्चा बड़ा होने लगा था, कि अचानक एक समाचारपत्र में प्रथम इंफोटेक फाउंडेशन का विज्ञापन देख, उन्हें अपना अधुरा सपना पूरा करने का रास्ता दिखाई देने लगा. “मैंने यह विज्ञापन देखा तो मुझ से रहा नहीं गया. उस ऐड में लिखा हुआ था ‘बच्चों को पढ़ाने की संधि’, मैंने अपने परिवार से बात की और उन्होंने हाँ कह दिया, और मैंने तुरंत इंटरव्यू के लिए ऑफिस में कॉल किया, और मुझे इंटरव्यू के लिए बुलाया गया.” तनिष्का ने इंटरव्यू दिया, कुछ टेस्ट हुए. उन्हें जो उनका सपना था वो मिल गया था. लेनिक कुछ हिचकिचाहट थी क्योंकि नया काम था, नई जवाबदारियाँ थी. “वहां योग्यता में मुझ से कई पैमानों में टीचर बहुत आगे थे, ऐसे में मुझे डर था की कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाये.” “लेकिन बहुत ही कम समय में वहां के सभी शिक्षकों ने मुझे अपना लिया, सभी बच्चे मुझे पसंद करते थे. ऐसे में मेरा मनोबल बहुत बढ़ने लगा था.”

“प्रथम इंफोटेक में चयन तो हो गया था लेकिन यह एक एनजीओ था, एनजीओ  में काम करने का बिलकुल भी अनुभव नहीं था. शुरुआत में मैं यहाँ बतौर शिक्षक नियुक्त हुई थी, लेकिन बाद में मुझे टीमलीडर बनने के मौका मिला. कंटेंट का कार्य संभाला, और अब मैं यहाँ टीम कोऑर्डिनेटर के पद पर नियुक्त हूँ.” तनिष्का का हाँथ बांटने के लिए उनकी टीम में 5 टीमलीडर है, जो की मुंबई पुणे और नासिक में करीब 40 स्कूलों के साथ कार्य कर रहें है. इन स्कूलों में 40 टीचर और करीब करीब 12,000 बच्चों के साथ तनिष्का कार्य कर रहीं है. तनिष्का की जवाबदारियों में न केवल पढ़ाई की बल्कि बच्चों की उपस्थिति से लेकर, बच्चों और उनकी टीम से सम्बंधित सभी प्रकार के मूल्यांकनों पर नज़र रखना की है, साथ ही डाटा पर नज़र रखना, वर्ष भर की प्लानिंग, बच्चों का शैक्षणिक टूर, शालाओं में अलग अलग अभियानों का आयोजन करवाना, अलग अलग एक्टिविटीज के जरिये न केवल बच्चों का बल्कि टीचर का मनोबल बढ़ाना है. “इनमे से कई चीज़ मुझे नहीं आती थी, लेकिन अनुभव और मेरे वरिष्ठ सहयोगियों के साथ कार्य कर कर के मैंने यह सभी बातें सीखी है.”

Tanishka's art

बात यहीं तक सीमित नहीं है तनिष्का के अंदर मल्टी टैलेंटेड पर्सनालिटी है. तनिष्का ने अनेक खेलों और प्रतिस्पर्धाओं में हिस्सा लिया है, और इनमे अनेक पुरुस्कार भी जीतें है. दौड़ स्पर्द्धा, लंबी छलांग, भला फेंक,लंगड़ी आदि खेलों में उन्होंने अपनी शाला का नाम रोशन किया है. यही नहीं, डांस में लावणी और कोली नृत्य, वन एक्ट प्ले, ड्रामा, शोज में खासी दिलचस्पी है. “डांस सीखने की मेरे बहुत इच्छा है लेकिन अब मुमकिन नहीं है. अगर मुझे मौका मिले तो कथकली सीखना चाहूंगी.”  वैसे एक ऐसी डांसर और अदाकारा है, जिनके नृत्य पर पूरा विश्व फ़िदा था; और मैं भी!!!, वही अदाकारा तनिष्का को भी बेहद पसंद है “माधुरी दीक्षित को डांस करते देखना अच्छा लगता था, वो मेरी पसंदिता डांसर है. मैं माधुरी के समान बनना चाहती थी. उनकी एक्टिंग और डांस मुझे बहुत पसंद है.”  



वैसे अगर आप सोच रहें है की कहानी यहाँ ख़तम हो गई है, तो ऐसा नहीं है. लता मंगेशकर को अपना आदर्श मानने वाली तनिष्का, खुद भी शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षण ले रही है. “मैंने हाल ही में क्लासिकल म्यूजिक की परीक्षा दी है और मैं यह कोर्स पूरा करना चाहती हूँ. मुझे संगीत विशारद बनने की ख्वाइश है.” चित्रकला में भी तनिष्का का काफी अच्छा हाँथ रहा है, पेंटिंग और स्केचिंग करना उन्हें बेहद पसंद है. “मुझे जब भी समय मिलता है कुछ न कुछ बनती रहती हूँ. इन सब चीज़ों से मुझे सुकून मिलता है.” 


Friday, 22 May 2015

सामाजिक बांधिलकीच्या अनुभवातून प्रगल्भ होत गेलो - राजेश डांगे

Rajesh Dange

प्रत्येक माणसात एक राजहंस दडलेला असतो. तो दडलेला राजहंस शोधून त्याला आकार देणेही  तितकेच महत्वाचे असते. अनुभवातून माणूस प्रगल्भ होत असतो, असे म्हणतात.  स्व कौशल्याच्या जोरावर सुरुवात करून कारकीर्द घडवणारी मंडळी आपल्याला पहायला मिळतात. अशाच एका सालस व्यक्तीच्या जीवनाविषयी...  

मी मुंबईतच लहानाचा मोठा झालो. आई-वडिल, आजोबा आणि नातेवाईक देखील मुंबईतलेच. माझा जन्म बी.ए.आर.सी. वसाहतीमधला असून आजोबा भाभा अणुसंशोधन केंद्र (BHABHA ATOMIC RESEARCH CENTER) म्हणजेच बी.ए.आर.सी.त कामाला होते. आजोबा निवृत्त झाल्यानंतर आम्ही कुटुंबासोबत गोवंडीला रहायला आलो. माझे त्यावेळी वय होते ६ वर्षे. आम्ही ट्रॉम्बेतली बी.ए.आर.सी. वसाहत सोडल्यानंतर  गोवंडीला  स्थायिक झालो.

देवनारच्या कुमुद विद्यामंदिर शाळेत माझे शिक्षण झाले. वडिल खाजगी कंपनीत कामाला होते. घरात मी, आई – वडील आणि तीन बहिणी असे सहा जण. मध्यमवर्गीय घरात जशी काटकसर चालते, तशी आमच्याकडेही होती. दहावीपर्यंत मी स्वत:चा अभ्यास स्वत:च करत असे. आचार्य महाविद्यालयात बारावीपर्यंत शिक्षण घेतले. मुंबईतल्या १९९२-९३च्या दंगलीचे  सावट बारावीच्या परीक्षेवर असल्यामुळे अभ्यासात द्विधा मन:स्थिती होती. बारावीच्या परीक्षेत माझे दोन विषय राहिले. मार्च आणि ऑक्टोबरमध्ये त्या विषयांची परीक्षा दिली. परंतु त्या दोन विषयांनी माझी पाठ काही सोडली नाही.  मी सुट्टीच्या दिवशी वडिलांसोबत कामावर जात आणि त्यांना थोडीफार मदत करत असे.  माझ्यासोबत दहावी उत्तीर्ण झालेले माझे मित्र बेस्टमध्ये नोकरीला लागले होते. त्यांनी मला सांगितले, ‘तुला  दहावीला चांगले टक्के आहेत. तर तु अभियांत्रिकीला (इंजीनिअरिंग) जा.’   दहावीत ७८ % मला मिळाल्याने मी बेस्टमध्ये  अप्रेंटीशिपला सुरुवात केली. ते करताना  स्टायपेंड (मानधन) देखील मिळत होते. बेस्टमध्ये मी मोटर मेकॅनिकलचा तीन वर्षाचा कोर्स पुर्ण केला. पहिल्यावर्षी पाठ्यपुस्तकातील अभ्यासक्रम, दुसऱ्यावर्षी वर्क शॉप ट्रेनिंग आणि शेवटच्यावर्षी बस आगारातील अनुभव देण्यात येतो. मी १९९५ ला बेस्टची  एनसीव्हीटी (नॅशनल कौन्सिल फॉर वोकेशनल ट्रेनिंग) परीक्षा देऊन उत्तीर्ण झालो.

शिक्षण पुर्ण झाल्यानंतर नोकरीची कसरत सुरु झाली. तीन-चार ठिकाणी प्रयत्न करूनही काम मिळाले नाही. त्यानंतर मी राहत असलेल्या ठिकाणी ‘रतन मोटर्स’ या  गॅरेजमध्ये मला काम मिळाले. मी मोटर मेकॅनिकल म्हणून गॅरेजमध्ये आठ महिने काम केले. कामाच्या आठ महिन्यात मला खूप काही शिकता आले. मला रतन मोटर्समार्फत  मध्यप्रदेशमधील इंदौरला ‘मितसुबीशी’ या आंतरराष्ट्रीय कंपनीत  प्रशिक्षणाला पाठवले. वाहने जी तयार होऊन येतात, त्याबाबतचे ज्ञान मला मिळाले.      

बेस्टची अप्रेंटीशिप पुर्ण झाल्यानंतर मी ‘महिंद्रा अँड महिंद्रा’  कंपनीत नोकरीसंदर्भात अर्ज करून ठेवला होता. रतन मोटर्समध्ये असताना मला महिंद्रा अँड महिंद्रा कंपनीतून विचारण्यात आले. मी क्षणाचाही विलंब न करता महिंद्रा अँड महिंद्रा कंपनीत काम करण्यासाठी होकार दिला. मला ‘महिंद्रा अँड महिंद्रा’मध्ये एक्सपोर्ट विभागात असेंब्लिंगसोबत सुपरवायझिंगची जबाबदारीही  देण्यात आली. महिंद्रा अँड महिंद्रामध्ये चांगल्या सोयी-सुविधा, ओव्हर टाइम आणि समधानकारक  पगार या सकारात्मक बाबी होत्या. त्यामुळे कुटुंबाला  आर्थिक स्थैर्य मिळण्यास देखील हातभार लागला.  महिंद्रा अँड महिंद्रा सात महिने काम केले. हे काम झाल्यानंतर एक महिना घरीच होतो, याच दरम्यान माझी एका व्यक्तीशी ओळख झाली.

महानगरपालिकेच्या शाळेत विद्यार्थ्यांना कॉम्प्युटर शिकवण्याचे वर्ग सुरु होते. त्या प्रकल्पाचे नाव होते  ‘प्रतिसृष्टी’. कॉम्प्युटर क्लासमध्ये शिक्षक  हे विद्यार्थ्यांना शिकवत. मी घरी असल्यामुळे संध्याकाळच्या वेळेत  माझ्या मित्रासोबत कॉम्प्युटर  क्लासमध्ये जात असे. त्यामुळे सर्वसाधारण संगणकाचे ज्ञान मला मिळत. माझे मराठी आणि हिंदी चांगले असल्यामुळे मला कॉम्प्युटरच्या मराठी पुस्तकांचे हिंदीमध्ये भाषांतर  करण्याची संधी मिळाली. मी  कॉम्प्युटर शिकण्यासोबतच अभ्यासक्रमाच्या पुस्तकांचे हिंदीत भाषांतर करू लागलो. त्यानंतर मी संस्थेत प्रतिसृष्टी प्रकल्पात ‘भाषांतरकार’ म्हणून अधिकृतरीत्या काम करू लागलो. पुस्तकाचे भाषांतर झाल्यानंतर ते  टंकलेखनाला (टायपिंग) जाते. त्यामुळे माझा संपर्क  टंकलेखन आणि डी.टी.पी. काम करणाऱ्या व्यक्तीशी आला. त्या व्यक्तीकडून मराठी आणि हिंदी  टंकलेखन शिकलो.  मुद्रितशोधन (प्रुफ रिडिंग), पेज मेकिंग, फोटोशॉप, कोरल ड्रॉ आणि पुस्तकाच्या निगडीत असलेले काम मी संबंधितांकडून शिकून घेतले. पुस्तकाच्या स्टॉक मेंटनन्ससोबत कधी-कधी लेखापाल (अकाउंट) विभागाचे काम देखील करत. अशा पद्धतीने माझ्यावर संस्थेची  ‘अष्टपैलू’ जबाबदारी असे. 

१९९८-९९ ला आमची शाळा या शाळेत प्रतिसृष्टीचे पहिले कॉम्प्युटर सेंटर सुरु झाले. सेंटरमध्ये विद्यार्थ्यांना कॉम्प्युटरचे सर्वसाधारण ज्ञान, एम.एस.ऑफिस, डी.टी.पी. आणि व्हिडीओ गेमच्या माध्यमातून शिकवण्यात येऊ लागले. दादर येथील हिंदू कॉलनीतून ही सर्व कामे होत असतं. कालांतराने  मशिद बंदर येथे कार्यालय स्थलांतरीत करण्यात आले. तेथील कार्यालयाच्या उभारणीची जबाबदारी देण्यात आली. एखादी कॉम्प्युटरविषयी समस्या आल्यास इंजिनीअरसोबत जाऊन ती पहायचो. समस्यांची सोडवणूक आणि सराव यांच्या माध्यमातून ‘कॉम्प्युटर हार्डवेअर’शी संपर्क आला. मुंबई बाहेर ज्या हार्डवेअरशी निगडीत समस्या असायच्या त्या मी हार्डवेअर प्रमुखांसोबत जाऊन सोडवून यायचो. महाराष्ट्रात नांदेड, सातारा, कोल्हापुर, सोलापूर, आदी बाहेरची कामे घेतल्यानंतर कॉम्प्युटरची ने-आण करण्यासंदर्भातील बाबींशी संबंध आला.  आमची शाळाची कॉम्प्युटर लॅब ही हार्डवेअर आणि इतर कामांसहित व्यवस्थित केली होती.  ते काम माझ्या स्मरणात आहे, कारण त्यानंतर कॉम्प्युटर हार्डवेअर हे महत्वाचे दायित्व माझ्यावर सोपवण्यात आले.  ‘पिक टॉक’चा एक उपक्रम हार्डवेअर माध्यामतून सुरु करण्यात आला होता. तोपर्यंत  हार्डवेअरची एक टीम तयार झाली होती. ‘पिक टॉक’ म्हणजे एक लहान उपकरण (डिवाइस) होतं. त्याच्या माध्यमातून विद्यार्थ्यांना बाराखडी  आणि कविता ऐकवली जायची. ठाणे,उरण,पनवेल, माणगाव, नाशिक आदी शाळांमध्ये पिक टॉक उपक्रम सुरु केला. मशिद बंदरचे कार्यालय टिळक नगर येथे आले आणि  तेथील अॅडमिनीस्ट्रेशनची जबाबदारी माझ्यावर देण्यात आली.  

आमच्याकडे प्रथम एज्युकेशन फाउंडेशनचा  इएफइ प्रकल्प आला होता. त्या प्रकल्पात गावातील लोकांना इ- एज्युकेशन  देण्याचे उद्दिष्ट होते. तो मोठा प्रकल्प आम्हाला मिळाला होता. त्या प्रकल्पाला २,३०० लॅपटॉप टप्प्याटप्प्याने दिले होते. गावातील लोकांना प्रशिक्षित स्वयंसेवकाकडून लॅपटॉपच्या माध्यमातून शिक्षण दिले गेले. महाराष्ट्रातील शाळांचे काम वाढत गेल्यावर हार्डवेअर आणि स्टॉकची जबाबदारी माझ्यावर सोपवण्यात आली.  चौदा वर्षाच्या कारकिर्दीत वेगवेगळे बदल संस्थेत होत गेले. सर्वात मोठा बदल म्हणजे तंत्रज्ञानाचा !

‘सगळ्या गोष्टीचे सोंग घेता येत, पण पैशाच सोंग घेता येत नाही.’ काम करताना आर्थिक अडचणींना सामोरे जावे लागत होते. तांत्रिक समस्या देखील यायच्या.  महाराष्ट्रात प्रवास करताना वेगवेगळ्या अनेक अडचणी येत. काही कालावधी असा गेला की, ‘दोन ते तीन महिने पगारच मिळाला नाही आणि काही वेळा अर्ध्या पगारावर काम केले’. या सर्व अडचणींना तोंड देत आम्ही जिद्द न सोडता काम करत राहिलो.

तंत्रज्ञानात वेगाने होणारा बदल आत्मसात करणे, याला आम्ही प्राधान्य दिले जाते. बाजारात नवीन तंत्रज्ञान आणि उपकरण आले, की त्याची माहिती माझ्यासह सर्व सहकाऱ्यांना असणे आवश्यक आहे. त्याची  काम करताना मदत होते. इंटरनेटच्या माध्यमातून विविध गोष्टी शिकण्यास मिळतात, माहिती कळते आणि काही प्रमाणात ज्ञान मिळण्यास मदत होते. इंजिनिअर्सची  अधून-मधून प्रशिक्षण दिले जाते आणि कार्यशाळा घेण्यात येते.  आमच्या हार्डवेअरमध्ये २० सहकाऱ्यांची टीम आहे. आम्ही ४०० पेक्षा जास्त शाळांसोबत काम करतो. त्याव्यतिरिक्त आम्ही २५ कंपन्यांसोबत काम करत असून त्यामध्ये शासकीय आणि खाजगी संस्थांचा समावेश  आहे.     

Rajesh with his family


माझ्या कुटुंबात मी, माझी बायको आणि एक मुलगी आहे. मागे वळून पाहताना असे वाटते की, जे परिश्रम मी घेतले आणि ज्या अडचणींना सामोरे गेलो. ते दिवस आता राहिले नाही, त्यामुळे मी आनंदी आणि समाधानी आहे.   

Tuesday, 19 May 2015

Dream big, work hard, reach for the skies...



Prajakta Mistry

Prajakta Mistry, a young and ambitious girl managed to complete her HSC in spite of various obstacles. Coming from a very humble background with only her father working to support a family of 5, she was left with no choice but to find a job after her HSC. As she was pursuing her MSCIT, she came across one of Pratham InfoTech Foundation’s (PIF) Sancharaks (computer instructor), who told her about the need of a Sancharak at one of PIF’s DigiTech centres.

In the year 2006, Prajakta was recruited by PIF as a Sancharak, following a month’s training. It was a whole new world for her, but she coped so well that in one year she was the favourite Sancharak of all the students as well as looked upon with affection and respect by the entire school staff. She says that the 2 years she spent working at Amchi Shalla, a school in Tilak Nagar, Mumbai, were very fruitful and here was born an interest and desire to learn more. She completed her DTP course and was soon offered a promotion to become Team Leader. As Team Leader, she coordinated with 10 schools, 22 Sancharaks and a total of 8,000 children. Along with excelling at her work, Prajakta also completed her graduation during this period and was promoted to a District Leader wherein she had to work with 3 Team Leaders, 108 schools, 139 Sancharaks and a total of 33,000 students across Mumbai, Navi Mumbai and Thane. She has also completed an Advanced Diploma in Information Technology.

She was later made District Coordinator of Mumbai, Navi Mumbai and Thane with 81 DigiTech Centres in 110 schools to look after along with a team of 127 Sancharaks.
Prajakta tied the knot in 2013 and took a maternity break shortly after. Not forgetting her dedication and zeal that she had put in all the past years, PIF welcomed her back as Head of the India Digital Inclusion Program (IDIP) in Mumbai and Navi Mumbai.  
Prajakta says she loves her role and is looking forward to give it her best and also to learn something new each day.

Prajakta stands out of the rest for all the responsibility that she took up so positively and the vigour with which she is moving ahead. She feels very passionate about reaching out to the children and youth of India – in rural and urban areas – with IT and connecting them to suitable employment. She herself strives to continuously update her computer knowledge. She thanks PIF and all her colleagues for their support and cooperation without which she feels that she wouldn’t have been able to achieve what she is today.

 Prajakta is loved by everyone wherever she goes and sets a good example of how to take life with what it offers and make the most of it! In spite of starting small, Prajakta Mistry is now living her dreams and aspires to reach greater heights. 

Friday, 15 May 2015

‘देव’नार मधल्या ‘गणेश’चा जीवन-संचार…


Ganesh Masurkar

‘टाकीचे घाव सोसल्याशिवाय “देव”पण येत नाही’. नावात काय आहे ? नावात ‘गणेश’ असून सुद्धा मार्गात अनेक ‘विघ्ने’ आली. वयाच्या चौदाव्या वर्षीच जगण्याच्या संघर्षाला सुरुवात झाली. घरातल्या आर्थिक परीस्थितीची जाणीव झाल्यावर शिक्षण सोडून नोकरी पत्करणे गरजेचे होते, कारण मागच्या लहान दोन बहिणी आणि एक भाऊ यांच्या शिक्षणाला प्राधान्य देणेही तितकेच महत्वाचे होते. हा ‘समजुतदार’ इयत्ता आठवीत असताना कुठून येतो ? आपण काय करतो वयाच्या १४ व्या वर्षी ? या जाणून घेऊया गणेशच्या आयुष्याबद्दलचा प्रवास...

मी गणेश मसुरकर. मुंबईतील देवनार आगार येथे मी आणि माझे कुटुंब लहानपणापासून राहत होते. आमचे पालन-पोषण मध्यमवर्गीय कुटुंबात झाले. मी पाच वर्षाचा असतानाच वडील एका अपघातामध्ये आम्हाला सोडून गेले. घरची संपूर्ण जबाबदारी आईने स्वीकारून आम्हाला लहानाचे मोठे केलं. मी, माझ्या दोन बहिणी आणि एक भाऊ असे कुटुंब असून आईने परीस्थितीशी दोन हात करून आम्हाला वाढवले. तिच्या परीने जेवढं तिला शक्य होतं, तेवढं तिने आमच्यासाठी केलं.

माझे शिक्षण बृहन्मुंबई महानगरपालिकेच्या शाळेत पहिली ते सातवीपर्यंत झालं. माझा अभ्यास वडील घ्यायचे. ते डायमेकर इंजिनियर होते. कंपनीकडून ते काम मिळवत आणि ते काम घरी करत असे. त्यांचे उत्पन्न देखील जेमतेम होते.  महानगरपालिकेच्या शाळेत असल्यामुळे शिक्षणाचा खर्च कमी होता. आठवीनंतर दुसऱ्या शाळेत प्रवेश घ्यायचा होता, परंतु दोन बहिणी आणि एक भाऊ यांचे देखील शिक्षण व्हायचे होते. आई एकटीच कामाला असल्यामुळे तिची तारेवरची कसरत मी पाहत होतो. त्यामुळे मी आठवीला शाळा सोडण्याचा निर्णय घेतला. आईला आणि घराला आर्थिक हातभार लागण्याच्या दृष्टीने मी नोकरी करायला सुरुवात केली.  

चेंबूर रेल्वेस्थानकाजवळ जेराड ऑप्टीशियन हे चष्म्याचे दुकान होते. तेथे मी साफसफाई करण्याचे काम केले. हे काम मी सलग आठ वर्षे केलं. दुकानाचे मालक चांगले होते, तसेच त्यांना माझे काम आणि स्वभाव  आवडायचा. मालकांनी मला एकदा विचारले, ‘तुला हे काम शिकायला आवडेल का ?’ मी क्षणाचाही विलंब न करता ‘हो’ म्हणालो. त्यांनी मला चष्म्याच्या संदर्भातील तांत्रिक ज्ञान शिकवून मला पदोन्नती (प्रमोशन) दिली. ग्लेजर मशीन, स्टाटन, लेन्स फिटिंग ग्लास सरफेसिंग,डाय, पॉलिशिंग, मार्किंग, कटिंग,पॅटर्न यांसारख्या वेगवेगळ्या कौशल्यपूर्ण गोष्टी मी आत्मसात केल्या. मी नोकरीला लागल्यामुळे घरात थोड्याफार प्रमाणात आर्थिक स्थैर्य आले. जेराड ऑप्टीशियनमध्ये मी ७ वर्षे काम केले. तसेच बहिणी आणि भावाचे शिक्षणात कोणताही खंड पडला नाही. जेराड ऑप्टीशियनमध्ये कामाला असतानाच माझे लग्न झाले. लग्न म्हणजे तो प्रेम विवाहाच ! मी जिथे रहायला होतो तिथेच ती राहत होती. लग्नानंतर एक मुलगा आणि एक मुलगी असा आमचा परिवार आहे. 

मी जिथे राहत होतो. त्या विभागात माझे चांगले नाव होते. तिथे राहत असणाऱ्या एका व्यक्तीबरोबर माझा वाद झाला आणि ते प्रकरण पोलीस ठाण्यापर्यंत गेले. मी कोणता गुन्हा केला, याची काहीच कल्पना मला नव्हती ? मी त्या प्रकरणानंतर चष्म्याच्या दुकानातील काम देखील सोडले. त्यानंतर दोन महिने घरीच होतो. मग मनाला विचारलं... काय करायचं ? रिक्षा शिकुया. रिक्षा शिकलो आणि त्यानंतर रिक्षा विकत घेतली. रिक्षाचे कर्ज, देखभालीचा खर्च, इ. गोष्टींमुळे जेमतेम घर चालत होतं.  प्रवाशांना रिक्षाच्या माध्यमातून सेवा देण्यास सुरुवात केली...ती अखंडपणे सात वर्षे...

माझा मित्र दीपक धोपट हा माझ्याच वस्तीत रहायला होता. त्याने माझ्या कामासंदर्भात प्रेम सरांकडे शब्द टाकला. त्यानंतर मी ‘संचार इन्फोटेक प्रायवेट लिमीटेड’मध्ये कामाला लागलो. सुरुवातीला माझा ‘संचार’ हा कार्यालयातील बाहेरची कामे करण्यात होता. सुरुवातीला बँकेत जाणे, मार्केटमधील कामे करणे, इ. कामांची जबाबदारी माझ्याकडे होती. त्यानंतर मला कॉम्प्युटरच्या हार्डवेअर विभागातील काम देण्यात आले. हार्डवेअरमधील सर्व सहकाऱ्यांनी कामाच्या संदर्भात मदत केली आणि शिकवले देखील... सहकारी मित्रत्वाच्या नात्याने शिकवत असल्यामुळे मी कामाबाबतच्या गोष्टी लवकर आत्मसात करु शकलो. संगणकाची बाराखडी गिरवता गिरवता कधी कॉम्प्युटर इंजिनिअर झालो, हे मला देखील कळले नाही. ज्या व्यक्तीला कधी कॉम्प्युटर माउस हे काय आहे ? हेच माहित नव्हते. तो आज  कॉम्प्युटर सहजरित्या हाताळू शकतो. याचा कधी कधी मी विचार करत असतो. लहानपणी शिकून मोठं झाल्यावर काय व्हायचं हे ठरवायला वेळच मिळाला नाही. कधी वेळ मिळाला तर काम करून कुटुंबाला आर्थिक हातभार कसा लागेल, याचाच विचार करत असतो.

‘आपण लोकांबरोबर जसे काम करतो. तसेच लोक आपल्यासोबत वागतात,’ हा माझा अनुभव आहे. मी मुंबईत भरपूर फिरलो. कोणत्या ठिकाणी  कुठच्या पद्धतीची लोक भेटतील, याची मला कल्पना नव्हती. तो अनुभव मला संचारने दिला. लोकांशी बोलण्याची पद्धत, विविध जीवनकौशल्ये, राहणीमान, बाहेरच्या जगात घडणाऱ्या घटनांची माहिती अशा अनेक गोष्टी संचार इन्फोटेक प्रा.लि.मध्ये शिकता आले. एखाद्या वस्तुची हाताळणी आणि नीटनेटका सांभाळ, व्यवस्थित आणि वेळेत काम करण्याची जबाबदारी, चूक स्वीकारण्याची तयारी, इ.गोष्टी सोबत असणाऱ्या सहकाऱ्यांकडून शिकता आल्या. शाळा आणि विविध क्लायंटच्या हार्ड वेअरची जबाबदारी माझ्यावर असते.  मी शिक्षणासाठी वेळ काढून कला शाखेच्या दुसऱ्या वर्षात शिकत आहे.  

माझा प्रेमविवाह. आमच्या कुटुंबात प्रेमविवाह करणारा मी पहिलाच. मी, बायको, एक मुलगा आणि एक मुलगी असा माझा लहानसा परिवार आहे. लग्नाला पंधरा वर्षे झाली असून त्यावेळी मी जेराड ऑप्टीशियनमध्ये कामाला होतो. दोन्ही मुलांना चांगल शिक्षण देऊन त्यांची आवड असेल, त्या क्षेत्रात त्यांना करियर करण्याचे स्वातंत्र्य द्यायचे आहे. त्यासाठी मी स्वत: सक्षम होण्याला देखील प्राधान्य असेल.

Ganesh with his wife and kids

मी प्रेम सरांना जीवनात आदर्श मानतो. कारण त्यांचा प्रवास मी लहानपणापासून आणि जवळून पहिला आहे. मी त्यांच्याकडे पाहून नेहमी काहीतरी शिकण्याचा प्रयत्न करत असतो. माझ्या आजवरच्या वाटचालीचे श्रेय मी माझ्या कुटुंबाला आणि परिस्थितीत साथ देणाऱ्या सहकाऱ्यांना देतो.




Tuesday, 12 May 2015

Family support can take a child a long way...



Preetam Kumar

Preetam Kumar, a young boy of standard 8 and a diligent student in PIF’s Digital Literacy as Life Skill (DLLS) program, topped the term this year. With confidence beaming from his face, he says, he owes it all to his family!
And sure enough, we got the same feeling while in conversation with his family.

Preetam’s father is a rickshaw driver while his mother is a home maker.

His interest in computers had started growing since a few years now. He says, he liked learning about computers, but what he got was not enough. “In school we were taught only a limited amount of things. It was all very notebook specific, not much practical. I am glad I joined the DLLS course. Here I get much more. Not just knowledge and extra time, but also the understanding of its application”.

When asked about his experience with the DLLS program, he had a lot to share. “In class we are taught as per projects. And so it becomes not only easier but also interesting and at times very fascinating too.” Preetam loves drawing and so sections like corel draw and photoshop are dear to him. “I also have my own e mail id now”, says a delighted Preetam. “The MS Power point in school includes only slides. But here in class there is a bit on animation and wonderful effects too.”

He goes on to say, “In school they teach us MS Excel with all the formulas, but here in the DLLS program, they teach us how to make a bill and the other uses of Excel. Now I can help anyone in making bills around my neighbourhood”. 

Preetam wants to become a chemical engineer when he grows up and this interest in him is strongly supported by his entire family. “I am very happy that my parents want the same for me. They have always encouraged me to do whatever I want and that helps me”.

Preetam and his uncle

 His uncle had a lot to say about his nephew too. “Preetam is an extremely well behaved boy. We know he can do a lot and so always encourage him. We would want him to follow his dreams and do whatever his heart tells him to do”.

When asked about IT and if they, as a family think there is a future in it for Preetam, his uncle said, “I don’t know much about the details, we are not that educated, this is all new to us and so we would love it if Preetam gets some IT exposure. All I know is now a days everyone seems to be working on a computer, it is everywhere. Who knows, IT might do Preetam some good and he might make it his career in the future”.

His aunt, who is also a home maker says, “Peetam learns something in class and then comes home and enthusiastically shares with us, all that he learnt. It feels good to watch him take so much interest”.

Preetam’s desire to learn more and the encouraging atmosphere that he is being brought up in helps him practice for an hour each day, all that he learns in class.
He says his idol is his family! “They mean the world to me. Each member of my family is so supportive. They do all they can to help me live my dreams. I respect them and want to be just like them.”

When asked what he thought his strength was, he promptly said,” I am a thinker. My ability to think into depth and to think ahead is my strength.”

Preetam is now looking forward to what he will be learning next year in the DLLS program. He wants to keep learning and adding to his knowledge.” I love drawing and I love computers too. And so I would love to know more about Corel draw and Photoshop, so that I can take both my interests ahead and do something big about it”.






Monday, 11 May 2015

माँ को आदर्श मानती हूँ – प्रियंका कालेल


Priyanka Kalel

प्रियंका कालेल रोटरी क्लब और प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन द्वारा चलाये जा रहें “इंडिया डिजिटल इन्क्लूज़न (आई डी आई)” की छात्रा है. कंप्यूटर एजुकेशन को बढ़ावा देने के लिए चलाये जा रहे इस प्रोग्राम में प्रियंका ने अव्वल अंक प्राप्त किए है. और इस उपलब्धि के लिए उन्हें पुरुस्कृत भी किया गया है. प्रियंका को कंप्यूटर का शौक बहुत पहले से ही था, लेकिन आई डी आई के इस कोर्स ने प्रियंका को प्रैक्टिकल ज्ञान दिया “मुझे कंप्यूटर का ज्ञान कम था, स्कूल कंप्यूटर था, लेकिन ढेर बच्चों के बीच में एक कंप्यूटर होने के कारण कभी इस्तेमाल करने नहीं मिल पता था. जिसके चलते मुझे उपरी ज्ञान था, लेकिन इस कोर्स को करने के बाद मुझे कंप्यूटर का अच्छा ज्ञान हासिल हुआ है. इस कोर्स में कंप्यूटर पर ही अलग- अलग एप्लीकेशनों का प्रैक्टिकल इस्तेमाल करने मिला, जिसके चलते मैंने बहुत कुछ सीखा है.”

इस कोर्स में एम् एस वर्ड, पॉवरपॉइंट, एक्सेल, क्लिप आर्ट, इन्टरनेट जैसी और भी कई बातों की जानकारी दी जा रही है. जो की बच्चों को कई मायनों में बहुत जरुरी है. प्रियंका बताती है की “मैं अपने कॉलेज के प्रोजेक्ट्स बनाने में इन एप्लीकेशनों का इस्तेमाल करती हूँ.” “मुझे अब किसी और की मदद लेने की जरुरत नहीं पड़ेगी अब मुझे भी पता है की वर्ड या पॉवरपॉइंट का इस्तेमाल, स्लाइड या प्रोजेक्ट बनाने के लिए कैसे किया जाता है.” “मुझे सबसे ज्यादा मजा इन्टरनेट पर आता है, क्योंकि वहां सीखने के लिए, देखने के लिए इतना कुछ है जो पहले पता ही नहीं था.”    
प्रियंका की माली परिस्थिति अच्छी न होते हुए भी, जब कभी साइबर कैफ़े जाना हो पता था, तो अभ्यास का मौका मिलता था. आमतौर पर क्लास के अलावा सप्ताह में सिर्फ एक या दो दिन ही में साइबर जाना हो पता था. “मुझे बहुत शौक है कंप्यूटर सीखने का, लेकिन क्योंकि घर में कोई साधन नहीं होने के कारण, मुझे अभ्यास के लिए साइबर में जाना पड़ता था. मुझे लगता है की कोर्स का टाइमिंग थोडा बड़ा देना चाहिए ताकि हम लोगों को वही अभ्यास का मौका मिल सकें.”

प्रियंका मेहनत पर विश्वास रखती है. उनका मानना है की बगैर मेहनत कोई उस मुकाम तक नहीं पंहुच सकता है, जो उसने ठहराया है. इसलिए “मैं अपनी माँ को अपना आदर्श मानती हूँ, क्योंकि पिता के बाद वो माँ ही थी जिन्होंने हमारे पढ़ाई की जद्द पकड़ी थी. वो घर- घर काम करके, मेहनत करके पढ़ाई के लिए पैसा जोड़ा करती थी”. आज भी माँ पास के ही पब्लिकेशन स्टोर में स्टीकर लगाने का कार्य करती है. प्रियंका के अलावा घर में दो बहने और भी है जिनकी पढ़ाई के लिए भी माँ बेहद उत्साहित है.”

प्रियंका अपने करियर के बारे में बोलती है की अभी तक उन्हे ठीक तरह से नहीं पता है की वो क्या करना चाहती है. लेकिन उनकी इच्छा है की वो एम् बी ए करें और अकाउंटेंट बने. “हाल ही में मैंने एक बैंक में इंटरव्यू दिया है, मैं उम्मीद कर रही हूँ की वहां पर मेरा चयन हो जाए.”, “मैंने प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन द्वारा चल रहें जॉब प्लेसमेंट के द्वारा भी कई जगह इंटरव्यू दिए है”.

कई बार हम सिर्फ पढ़ाई के स्तर पर ही बच्चों का आंकलन करतें है. लेकिन सही बात तो यह है की कई बच्चे पाठ्यक्रम से हट कर भी अपनी पहचान बना लेतें है. प्रियंका को पढ़ाई में जितनी रुचि है उतनी ही रुचि उन्हें चित्रकला और मेहंदी बनाने में भी है. प्रियंका बताती है “ मुझे गायन, चित्रकला और मेहंदी का काफी शौक रहा है. स्कूल और कॉलेज में मैंने कई बार प्रतिस्पर्धा में भाग भी लिया है और जीती भी हूँ. अगर मुझे ऐसा कोई मौका मिलता है की इन्ही में से किसी में अपना करियर बना सकूँ तो मैं शौकिया तौर पर एक साइड बिज़नस कर सकती हूँ.”

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Friday, 8 May 2015

समाज सेवेच्या माध्यमातून लोकांसाठी कार्य करायचे आहे. - भावेश म्हसकर

Bhavesh Mhaskar

बाबा आमटे या वडिलांच्या प्रेरणेतून डॉ. प्रकाश आमटे आणि त्यांच्या पत्नी डॉ. मंदाकिनी आमटे यांनी २३ डिसेंबर १९७३ पासून गडचिरोली जिल्ह्यातील भामरागड तालुक्यातील हेमलकसा येथे जो लोकबिरादरी प्रकल्प स्थानिक आदिवासी लोकांसाठी सुरु केला. आदिवासींचे शैक्षणिक, आर्थिक आणि आरोग्यविषयक विकास हा लोकबिरादरी प्रकल्पाचा उद्देश. बाबा आमटे माझे आदर्श असून त्यांच्यासारखेच काम मला करायचे आहे. ‘आपण ज्या समाजात राहतो, त्या समाजाचे आपण काही तरी देणे लागतो’ ही सामाजिक बांधिलकी जपणारा भावेश म्हसकर. या तर जाणून घेऊयात भावेशच्या वाटचालीविषयी... 

माझ्या कुटुंबात आई-वडिल लहान बहिण आणि मी असे चार जण आहोत. मोठ्या बहिणीचा विवाह झाला असून ती सासरी असते. वाणिज्य शाखेतून पदवी घेतल्यानंतर  मास्टर इन सोशल वर्क किंवा एम.कॉम. करायचा विचार आहे. सर्वप्रथम प्राधान्य मास्टर इन सोशल वर्कला  (एम.एस.डब्ल्यु.) असेल. पदवीनंतरचे  शिक्षण करताना  अर्धवेळ नोकरी करण्याचा माझा विचार आहे. त्यातून शिक्षणाचा खर्च भागण्यास मदत होईल. वडील खाजगी कंपनीमध्ये फर्निचरचे काम करत असून आई घरीच असते.  माझ्या मित्राकडून मला प्रथम इन्फोटेक फाउडेशनद्वारे सुरु झालेल्या  कॉम्प्युटर कोर्सची माहिती मिळाली आणि मी कोर्ससाठी प्रवेश घेतला.  

कॉम्प्युटर कोर्समधील सर्व विषय  शिक्षकांनी चांगल्याप्रकारे शिकवले. कोर्समधील पॉवर पॉइंट प्रेझंटेशन आवडलं. अॅनिमेशन आणि वर्ड इफेक्ट कशाप्रकारे द्यायचे ते कळाले. मायक्रोसॉफ्ट एक्सेलमधील वेगवेगळ्या प्रकारचे असते. उदाहरणार्थ,  एक्सेलमध्ये मार्कशीट (गुण पत्रिका) बनवायला शिकलो. गुणांचा आधार घेऊन आलेख तयार करणे आणि विविध प्रकारात ते दर्शवणे, या अभ्यासक्रमातील बाबी व्यवस्थित शिकता आल्या. त्यासोबत इंटरनेट आणि इ मेल यांसारख्या आवश्यक गोष्टी शिकवल्यामुळे त्यांचा दैनंदिन जीवनात फायदा होत आहे. माझ्या मते, कार्यालयीन किंवा इतर कामासाठी एक्सेल, इंटरनेट आणि इ मेल यांसारख्या विविध बाबी प्रत्यक्षात काम करताना उपयोग होतो आणि तेच सी.आय.टी. (कम्युनिटी इन्फॉर्मेशन ट्रेनिंग) सेंटरमध्ये शिकवले जाते. त्याचा फायदा आमच्यासारख्या विद्यार्थ्यांना होतो. क्लासमधून आल्यावर १५ ते २० मिनटे मी कोर्सच्या पुस्तकातून अभ्यास करायचो.

कोर्स करण्याआधी एक्सेल, पॉवर पॉइंट,सॉफ्ट वेअर, इ. गोष्टी मित्रांकडून कानावर पडल्या होत्या. परंतु त्या कॉम्प्युटर कोर्स शिकल्यानंतर आत्मसात करता आल्या. क्लासची वेळ योग्य होती. टॅली वेब डिझायनिंग यांसारख्या कोर्सेसचा समावेश अभ्यासक्रमात व्हावा, असे मला वाटते.  
 
आय.डी.आय.(इंडिया डिजीटल इनक्लुजन) कोर्समधील शिकलेल्या गोष्टींचा वापर मी ब्लॉग लिहिताना आणि  इमेज एडिटिंगसाठी करतो.  माझा स्वत:चा कवितांचा ब्लॉग आहे. १२वीत असल्यापासून कविता लिहित आहे आणि एक वर्षापासून  मी ‘एक प्रियकर’ हा ब्लॉग लिहिण्यास सुरुवात केली आहे.  मला वाचनाचा छंद आहे. सध्या सामाजिक विषयांवर लेख लिहिण्याचा प्रयत्न करत आहे. कचरा व्यवस्थापन, ‘स्वच्छ भारत अभियान’ आणि ‘जाती व्यवस्था नष्ट करून माणूस म्हणून माणसाकडे बघण्याचा दृष्टीकोन समाजाने ठेवला पाहिजे.’ या विषयांवर लेखन केलं आहे. 
डॉ. प्रकाश आमटे या चित्रपटाच्या माध्यमातून मला आमटे कुटुंबियांचे सामाजिक कार्य समजले. त्यांच्या कार्याच्या प्रेरणेतून मी समाज सेवेचे शिक्षण घेऊन सामजिक कार्यात योगदान  देण्याची  माझी इच्छा आहे.

“सुजलाम, सुफलाम भूमी इथली, सुवर्ण झाली माती...

जपली संस्कृती, जपली नाती, वाढवीली प्रगतीची गती...
घामात भिजलेला महाराष्ट्र माझा....
प्रिय आम्हाला हा महाराष्ट्र माझा.....
भजनात दंगलेला महाराष्ट्र माझा...
घामात भिजलेला महाराष्ट्र माझा...
रंगात रंगलेला महाराष्ट्र माझा...
प्रिय आम्हाला हा महाराष्ट्र माझा ”


                                                  सौजन्य – एक प्रियकर ब्लॉग, भावेश म्हसकर

Thursday, 7 May 2015

Be 'e literate' and spread 'e literacy'

Ankita Pawar

“IT is everywhere”, were the first words Ankita uttered when in conversation with the Communications team, at Pratham InfoTech Foundation (PIF). Daughter of a mill worker and a home maker, Ankita Kalel topped the Digital Literacy course this term. As soon as Ankita was done with her H.S.C. board examinations, she was waiting for something to do. Just then her neighbour told her about the newly opened computer center in their community. “I was excited and went in to enquire. I was told there were IT courses and soft skills training. I did not know what soft skill meant but I wanted to give it a try”. She got herself enrolled at Samarth Vidyalay which was quite close to her house.

Ankita had learnt all about computers at school but was never satisfied. “I only knew the basics. In school we were taught more of theory, hardly any practical. Here, at the center I learnt a lot of new things, uses and application and had time to practice on the computer too”.  She was also happy with the soft skills training. “We were taught how to talk to people, how to present ourselves etc. I have built up a lot of confidence now. Earlier I could never speak to anyone other than my family and very close friends. Today there is no hesitation and no fear at all. Now when I go for an interview I am confident I will do well ”.

 “As I don’t have a computer I could not practise at home, so I just kept reading what I had noted down  in class and imagine the practical part. I always wanted to do some sort of IT course but couldn’t manage the time along with my college.” Ankita believes there are a lot of benefits from this course and that it will be useful to her no matter what kind of job she gets.

“ I want to be a lawyer”. When asked how will IT help her in future she said, “I can use IT whenever I need to search for any information online”.

After completing the course and topping it too, Ankita did not stop. She entered into a one month internship program with PIF. “Knowledge is important but on the job training and experience is crucial to be successful and confident. And this I got from my internship”.

All this was still not enough, there was no stopping now. Ankita was completely immersed in the field of IT. Seeing her dedication and zeal, she was selected as a Sancharak (computer instructor) in the same school. She is currenly loving her job. “I have to teach whatever I learnt. And I love it”.

Everyday an enthusiastic Ankita wakes up, goes to college, does her studies at home, completes her house hold chores and rushes for class, the most awaited part of her day!

This district level kabaddi player and a lover of history is determined to make a mark somewhere. “I want to keep learning, earning and share my dad’s burden”.

Ankita with her students


Monday, 4 May 2015

मैं बच्चों को सिखा सकती हूँ – स्मिता गावंड

Smita Gavand

भारत दुनिया के सबसे बड़े बाज़ारों में से एक है, यहाँ हर किसी के कार्य को मान्यता है. यहाँ हर कोई अपनी इच्छा से कार्य कर भी सकता है और कार्य के बदले में मेहनताना भी कमा सकता है. लेकिन, जरा ठहरिये सभी कार्य को मान्यता है? मुझे लगता है की इस बात का जवाब वो ज्यादा अच्छे से दे सकती है, जो घरेलू कार्य करने के बाद भी घर वालों की प्रशंसा की पात्र नहीं बन पाती. जी हाँ हम बात कर रहें है “गृहणियों” की, जो घरों में सुबह से लेकर शाम तक हजारों कार्यों को अपने अंजाम तक पंहुचती है. साफ़ सफाई, खानपान, बच्चों से लेकर बड़ों तक सबकी सेवा में अपना बहुमूल्य समय देना क्या कोई आम बात है? आइये आज एक ऐसी ही दास्तान पर ध्यान केन्द्रित करतें है और जानतें है की अगर यह गृहणी घर से बाहर निकलें और कुछ करें तो क्या नहीं कर सकती...


मुंबई से लगे चेम्बूर इलाके के एक गाँव माहुल की स्मिता गावंड की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, कहने को तो स्मिता एक हाउस वाइफ है, लेकिन उन्हें घर के कामों से अलग हट कर कुछ करने की ख्वाइश हमेशा से रही है. जिसके चलते स्मिता ने प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन द्वारा चलाये जा रहे डीएलसी प्रोग्राम में भाग लिया. इस कार्यकम के अंतर्गत कंप्यूटर से सम्बंधित जानकारी दी जाती है. जिसमे कार्यक्रम में अलग अलग मोड्यूल के आधार पर लोगों को प्रशिक्षित किया जाता है. प्रथम इन्फोटेक द्वारा चलाये जा रहे इस प्रोग्राम में अलग अलग उम्र के बच्चों, बड़ों और हाउस वाईफ के लिए अलग अलग बैचों में प्रशिक्षण दिया जाता है.

स्मिता गावंड ने इसी प्रोग्राम के तहत हाउस वाइफ के बैच में दाखिला ले कर कंप्यूटर की बुनियादी बातों का प्रशिक्षण हासिल किया और यही नहीं इस प्रशिक्षण के बाद हुए परीक्षा में वो अव्वल नंबरों से उत्तीर्ण हुई, और उन्हें पुरूस्कार से भी नवाज़ा गया है. स्मिता कहती है कि “घर से बाहर जा कर कोई कोर्स करना बहुत कठिन होता है, ख़ास तौर पर जब आप एक हाउस वाइफ हो. आपके ऊपर कई जिम्मेदारियां भी होती है, और कई बातों को सोचना और समझना भी पड़ता है. ऐसे में परिवार के सहयोग के बिना यह सब नामुमकिन था.”

Smita with her computer instructor

प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन द्वारा चलाये जा रहे इस कार्यक्रम में अलग अलग बैच होने का फायदा सबसे ज्यादा हुआ है, जिसके चलते प्रशिक्षण ले रहें तमाम लोगों को व्यक्तिगत रूप से सिखाया जाता है. स्मिता ने बताते हुए कहा कि “कंप्यूटर के बारे में पहले से पता तो था, लेकिन कभी इस्तेमाल नहीं किया. जब कॉलेज में थे तब थोडा बहुत चलने मिल जाता था लेकिन इतना एक्सपोजर नहीं मिल पाता था. यहाँ पर अलग अलग बैच होने का यह फायदा था की सभी हाउस वाइफ को अलग अलग कंप्यूटर पर प्रशिक्षण हासिल हुआ है, और ऐसे में मुझे काफी सीखने मिला.”

इस कोर्स को 3 मोड्यूल में बांटा गया है. जिसमे से पहला मोड्यूल है ऑपरेटिंग सिस्टम जिसमे पहले से लेकर अभी तक जितने भी ऑपरेटिंग सिस्टम है, उन सभी की जानकारी मोहैया करवाई जाती है.  दूसरे मोड्यूल में माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस के सभी अप्लिकेशनों की जानकारी दी जाती है. जिसमे वर्ड, एक्सेल, पॉवरपॉइंट, क्लिप आर्ट, डाटा एंट्री आदि बातों की जानकारी होती जाती है. तीसरे मोड्यूल में इन्टरनेट और इन्टरनेट की मदद से अनेक कार्य करने के बारे में जानकारी दी जाती है.

स्मिता को इन्टरनेट मोड्यूल में सबसे ज्यादा मज़ा आया था, क्योंकि “अक्सर सुना करते थे, की इन्टरनेट पर शॉपिंग होती है. लेकिन कभी देखा नहीं था, लेकिन अब मुझे इन्टरनेट पर शॉपिंग करना बहुत पसंद है.” जहाँ तक इस कोर्स के बाद क्या करने का विषय है तो स्मिता का मानना है की अगर घर से मुझे कार्य करने की इजाजत मिलती है तो कहीं पार्ट टाइम कार्य करना चाहेंगी. नहीं तो जो कुछ भी मैंने सीखा है वो मैं बच्चों को सखाऊँगी, जिससे उनके प्रोजेक्ट्स और दूसरे कार्यों में मदद मिल सकें. “अगर इसी कोर्स का कुछ और एडवांस कोर्स आये तो मैं जरुर वो भी करना चाहूंगी, मुझे लगता है की अगर क्लास का समय थोडा बढ़ा दिया जाए और कुछ और नए कोर्स लाये जाए तो मैं आगे भी सीखना चाहूंगी.”

मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखने वाली स्मिता ने शिक्षण “एम्ऐ रूरल डेवलपमेंट” में किया है. स्मिता को टीचिंग करने का बहुत शौक था. जिसके लिए वो आगे पढ़ाई भी करना चाहती थी, लेकिन एम्ऐ करने के बाद शादी हो जाने की वजेह से उन्होंने पारिवारिक कार्यों को ही अपना लक्ष्य बना लिया. “अगर मुझे मौका मिलता तो मैं पॉलिटिकल साइंस की पढ़ाई भी करना चाहती हूँ. लेकिन शादी के बाद घर और परिवार ही अभी सब कुछ है.”

Smita with her in laws