Friday, 26 June 2015

समय के साथ साथ सीखना और खुद को बदलना मुझे आता है - वर्षा भालेराव


Varsha Bhalerao

कई बार लोग जिस परिस्थिति में होते है वो वहां से ऊपर आने के बारे में सोचते तो हैं; लेकिन जिंदगी को बदलने की उनमे कोई ख़ास दिलचस्पी दिखाई नहीं देती. इसके विपरीत कई लोग ऐसे भी होतें है जो, उन परिस्थिति को बदलना चाहतें है और निरंतर आगे बढ़ते हुए एक कीर्तिमान बनाना चाहतें है. आइये आज हम वर्षा की कहानी से यह समझने की कोशिश करतें है की, अगर मौका मिल जाये तो; कभी भी, किसी भी परिस्थिति पर विजय प्राप्त की जा सकती है. यह कहानी आज 30 साल पहले शुरू होती है, जब सोलापुर के एक छोटे से गाँव से वर्षा के पिता; वर्षा की माता, दो बेटियां और एक बेटे के साथ मुंबई आये, इरादा था एक खुशहाल जीवन यापन करने का. लेकिन परिवार, बेहद नाजुक परिस्थिति से गुजर रहा था, गाँव में आजीविका का कोई भी साधन नहीं था, मुंबई में एक नया जीवन शुरू करने की आस लिए पिता पूरे परिवार के साथ यहाँ आ तो गए थे, लेकिन मुंबई में भी परिश्रम कोई कम नहीं था. आज इस परिवार ने कुछ हद तक, गरीबी पर जय जरुर हासिल कर ली है. लेकिन पारिवारिक संघर्षों को आज तक वर्षा भूल नहीं पाई है.

“ए फॅमिली इज़ ए स्माल वर्ल्ड क्रिएटेड बाय लव (अज्ञात)” यह परिवार प्यार के अनूठे बंधन से बंधा हुआ है; और आबाद है. कई वर्षों के संघर्ष के बाद आज यह परिवार अपने पैरों पर खड़ा हुआ है. किसी की मदद से पिता को मुंबई दूरदर्शन में छांयाचित्रकार (फोटोग्राफर) का कार्य मिल गया, जिसके चलते घर की परिस्थिति में सुधार आने लगा था, लेकिन फिर भी काफी समय तक घर का संघर्ष शुरू था. पिता कि ख्वाइश थी की, सभी बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, लेकिन ‘आमदनी अठन्नी थी और खर्चा रुपैया’ लेकिन बावजूद इसके पिता ने बच्चों को अच्छी शिक्षा देना की पूरी कोशिश की. जिसके लिए उन्होंने रात- दिन जी-तोड़ मेहनत करते हुए बच्चों का प्रशिक्षण पूरा करवाया. “बचपना मुझे अच्छे से याद है, माँ की तबियत ख़राब रहती थी और पिता कार्य के लिए चले जाते थे, और मुझे घर का सभी कार्य करना पड़ते थे.” “पढ़ाई के साथ साथ घर की जिम्मेदारियां भी मुझ पर ही आने लगी थी, और मैंने बिना किसी शिकायत के यह सभी कार्य करना शुरू कर दिया था.” शिकायत तो थी, क्योंकि घर के आसपास सबको खेलता देख उसकी भी इच्छा तो होती थी, लेकिन खुद की जिम्मेदारी का एहसास वर्षा को होने लगा था. उसे पता था की पढ़ाई करके ही, घर की इस परिस्थिति में सुधार लाया जा सकता है; आखिरकार ऐसा ही हुआ...

वर्षा ने 10 वी तक शिक्षण मुंबई के कुर्ला स्कूल में प्राप्त किया है. उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने मुंबई के एसएनडीटी कॉलेज में दाखिला लिया, जहाँ उन्होंने मनोविज्ञान (साइकोलॉजी) में शिक्षण हासिल किया है. इसके साथ ही सोशल वर्क और पैरामेडिकल में पेराप्रोफेशनल कोर्स का भी शिक्षण पूर्ण किया है. साथ ही साथ इंग्लिश और मराठी टाइपिंग, कंप्यूटर नेटवर्किंग कोर्स (सीसीएनए), डीटीपी जैसी विषयों का भी वर्षा ने महरत हासिल की है. इतना सब करते हुए भी कभी वर्षा ने उफ़ तक नहीं की, क्योंकि उनका ध्यय तय था, जॉब करना और पिता का सहायक बनना. जिसके चलते वर्षा को पहली जॉब ‘प्रथम’ संस्था में लगी, यहाँ वर्षा की शुरुआत वासंती नाम के एक प्रोग्राम से शुरुआत हुई, यह ग्रीष्मकालीन शिक्षण शिविर है, जिसमे 5 साल तक के बच्चों को प्रशिक्षण दिया जाता है. इसमें अक्षरों को पहचनना, संख्याओं का ज्ञान, गानों के आधार पर शिक्षण देना, और दूसरी एक्टिविटीज के जरिये बच्चों को तैयार करना वर्षा का कार्य होता था. इसे बालवाडी भी कहा जाता है. वर्षा को प्रथम में 2 बालवाडीयों के साथ कार्य का अनुभव है. इसके साथ ही ‘प्रथम’ “अनौपचारिक शिक्षण” में भी वर्षा को अच्छा अनुभव है, यहाँ वर्षा उन बच्चों के बीच में कार्य करती थी, जो अनुपस्थिती या किन्ही कारणों से अनुत्तीर्ण (ड्रॉपआउट) हो जाते थे, इस प्रोग्राम के जरिये उन्हें दोबारा शिक्षण देकर आगे बढ़ने का कार्य किया जाता था.

आगे बढ़ने की ललक के चलते वर्षा ने ग्रेजुएशन करना शुरू किया, अपनी अधूरी पढ़ाई उन्होंने अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण किया. ग्रेजुएशन के ख़त्म होते ही वर्षा ने प्रथम को अलविदा कह दिया और ऐरोली में बालवाडी के लिए टीचरों को प्रशिक्षित करने कार्य शुरू किया, यह कार्य उन्होंने 2 साल तक किया. 6 महीने के एक बैच में लगभग 50 से ज्यादा टीचरों को प्रशिक्षित किया जाता था. “इसमें सब ऐसे लोग थे जो बालवाडी में कार्य करना चाहते थे, हमने उन सभी लोगों को बच्चों के साथ काम करने से लेकर, सीखने के तरीकों के अलावा अलग अलग एक्टिविटीज जिसमे क्राफ्ट, ड्राइंग, अनुपयोगी वस्तुओं  से उपयोगी सामान बनाने का प्रशिक्षण आदि जानकारी दिया करते थे.” “इस प्रशिक्षण के बाद हम टीचरों को सर्टिफिकेट के साथ साथ उनके इलाकों में बालवाडी खोलने में भी सहायता किया करते थे.”

काफी समय तक शिक्षण के क्षेत्र से जुड़े रहने के बाद वर्षा एक वकील के साथ कार्य करने का मौका मिला. यह कार्य केस पेपर बनाने का था, जो भी रिफरेन्स वकीलों द्वारा दिए जाते थे, उन को टाइप करना वर्षा की जिम्मेदारियां थी. “क्योंकि मैंने टाइपिंग सीखी थी इसलिए मुझे यह कार्य आसानी से मिल गया, मेरा कार्य ऑफिस में ही रहकर टाइप करने का था, लेकिन कभी कभी मुझे कोर्ट में जाकर केस पेपर देने होते थे.” कुछ समय तक कार्य करने के बाद वर्षा को दोबारा शिक्षण के क्षेत्र से जुड़ने का मौका मिला. प्रथम इंफोटेक फाउंडेशन में टीचर (संचारक) की एक जॉब के बारे में पता चला और उन्होंने इस जॉब के लिए आवेदन दिया. यहाँ वर्षा का कार्य बच्चों को कंप्यूटर सीखन का था, बच्चों को यह ज्ञान अच्छे से मिल सकें इसलिए वर्षा ने एम्.एस.सी.आई.टी और डीटीपी जैसे कोर्स भी किए. “कोई अनुभव नहीं था, लेकिन बिना घबराये मैंने पढ़ाना शुरू कर दिया. थोडा सा डर था; लेकिन बच्चों के साथ साथ मुझे वहां के शिक्षकों ने भी खुले दिल से अपना लिया.” “आप कहीं भी कार्य क्यों न कर रहें हो, थोड़ी बहुत ऊँच नीच तो होती ही है, लेकिन आप कितना सीख कर, आगे बढ़ना चाहते है वो आपके हाँथ में होता है. मैंने भी सीखा और आगे बढ़ गई.”

Varsha at PIF

प्रथम इंफोटेक फाउंडेशन से वर्षा आज पिछले 7 साल से जुडी हुई है, और आज वर्षा संचारक से डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर के पद पर नियुक्त है. इस बीच वर्षा ने बतौर संचारक 2 साल तक 3 स्कूल और 2,000 से ज्यादा बच्चों के बीच में काम किया है. जिसके बाद बतौर टीम लीडर वर्षा ने 4 साल का कार्य अनुभव है और जिसमे 10 शाला, 12 संचारक और 3,000 से ज्यादा बच्चों के बीच उन्होंने कार्य किया है. और अब वर्षा डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर हैं, उनका साथ देने के लिए 11 टीम लीडर, जो 80 स्कूलों में, 34,000 से ज्यादा बच्चों के बीच में कार्य कर रहीं है. व्यवहार से कम बोलने वाली वर्षा को अब एक ऐसा कार्य मिल गया था, जिसमे उन्हें निरंतर बच्चों से, टीचर्स से, प्राध्यापकों से, ट्रस्टी से, और कई लोगों से बात करते हुए कार्य करना होता है. ऐसे में वर्षा ने अपने आप में कई बदलाव देखें है “अब मैं लोगों के सामने खुद को व्यक्त करने लगी हूँ, मुझे कॉन्फिडेंस आने लगा है.” “इसके साथ ही तुरंत चीज़ों को समझ लेती हूँ, कार्य के लिए नियोजन कर सकती हूँ. टीम के साथ कार्य करने के अलावा लीडरशिप स्किल से लेकर रिपोर्टिंग तक कई कार्य कर सकती हूँ” “मैंने अपने वरिष्ठ सहकारीयों से काफी कुछ सीखा है, बहुत कुछ मुझे मेरी परिस्थिति ने भी सीखा दिया है, समय के साथ साथ सीखना और खुद को बदलना मुझे आता है.” वर्षा को लिखने का भी बहुत शौक है. हर दिन जो भी उनके जीवन में होता है वो उन बातों को अपनी डायरी में लिखती है. “मैं उसमे कोशिश यह करती हूँ की, जो भी मैंने आज किया है, अगले दिन उससे अच्छा कर सकूँ. दरअसल डायरी लिखने से मैं खुद का आंकलन कर पाती हूँ.”



“पिता ने कड़ी मेहनत करके शुन्य से हमारा विश्व निर्माण किया है.” “मैं आज अपने पैरों पर खड़ी हूँ, लेकिन समस्याए आज भी काफी है. “इतने सालों में, जो मैं नहीं कर पाई हूँ वो मुझे करना है. दोस्त बनाना है, माता- पिता के साथ कहीं घूमने जाना है. 

Monday, 22 June 2015

गजरे विकणारे हात संगणकावर फिरू लागले - दयानंद गोरे

Dayanand Gore

दिवाळीचा आनंद आणि मौज पहायची तर ती  गिरणी कामगाराच्या घरी...बच्चे मंडळींची तर धम्मालच असे, अशी प्रतिक्रिया गिरणी कामगारांच्या तोंडून ऐकायला मिळते. संपामुळे गिरण्या बंद पडल्या आणि अनेक गिरणी कामगारांच्या कुटुंबांची घडी विस्कटली, ही घडी नीट बसवताना बरीच वर्षे गेली. कोणी सुरक्षा रक्षकाची नोकरी स्वीकारली, कोणी गिरण्यांच्या बाहेर वडा-पावचा व्यवसाय सुरु केला तर कुणाला चहाच्या टपरीने आधार दिला. अशाच एका गिरणी कामगाराचा मुलगा ज्याने शिक्षण करता करता घरच्या अर्थकारणाला मदत केली आणि कुटुंबाच्या उदरनिर्वाहासाठी सहाय्य केले. या तर जाणून घेऊया गिरणी कामगाराच्या मुलाची जीवन गाथा...

माझे गाव मुचरीमाळ रत्नागिरी जिल्ह्यातील संगमेश्वर तालुक्यात ! गावात कामाची वानवा असल्याने माझे आजोबा मुंबईत आले. वडिलांचे शिक्षण दहावीपर्यंत होते आणि  आई पाचवी शिकली होती. आमचे कुटुंब मुंबईत शिवडीला रहायला होते. त्यानंतरचे आमचे वास्तव्य चेंबूरच्या  घाटला गावात... घरात माझा मोठा भाऊ, मी  आणि लहान बहिण. वडील गिरणी कामगार होते. मुंबईत गिरण्या बंद झाल्यानंतर त्यांनी सिक्युरिटी गार्डची नोकरी ६ वर्षे केली. त्यानंतर वडिलांना काम करणे शक्य न झाल्याने आम्ही त्यांना विश्रांती घेण्यास सांगितले. घरी पैशाची चणचण भासली, तेव्हा आईने देखील घरकाम करण्यास सुरुवात केली.   

दादर येथील रुबी गिरणीमध्ये वडिल कामाला होते. गिरण्यांचा संप झाला आणि घरची आर्थिक घडी बिघडली. गिरणीच्या बाजूलाच फुल बाजार होता. वडिलांनी घरी फुलांच्या कळ्यांची पुडी आणली आणि त्याचे गजरे बनवायला सांगितले. आई गजरे बनवायची. तिने मला सांगितले की, ‘तु गजरे विक.’ आई गजरे बनवायची आणि मी ते विकत. सुरुवातीला १० ते २० पैसे दराने गजरे विकून मी दोन रुपये आणले होते. गजरे विकल्याने घरी पैसे येतात, हे कळल्यामुळे आम्ही गजरे बनवायला सुरुवात केली. वयाच्या बाराव्या वर्षापासून गजरे बनवून ते विकणे हा उद्योग सुरु झाला. त्यामुळे घराच्या अर्थकारणाला थोडा का होईना हातभार लागत होता.  बहिण नववीपर्यंत शिकली आणि त्यानंतर तिने शाळा सोडली. गजरे विकून पैसे आणल्यानंतर जेवणाला लागणारे तांदूळ, डाळ, भाजी, इ. स्वयंपाकाचा जिन्नस आणला जायचा. त्यानंतर आम्ही सर्वजण जेवायचो. आमचे कुटुंब गजरे बनवायच्या व्यवसायात उतरले होते. व्यवसायात आघाडीवर मी आणि आई होतो. लहान वयात अनवाणी पायी दादरला जायचो आणि फुलांचे गठ्ठे आणायचो. एकीकडे शिक्षण आणि दुसरीकडे काम अशी कसरत मला लहानपणापासूनच सुरु करावी लागली.  

आमचे शिक्षण महानगरपालिका शाळेत पूर्ण झाले. शाळेत असताना विविध खेळ खेळायचो. कामातून जेव्हा जेव्हा वेळ मिळत, तेव्हा मी मनमुराद खेळत असे. मला शाळा खुप आवडत, शाळेतले शिक्षकही चांगले होते. माझे अक्षर सुंदर असल्यामुळे माझे शिक्षकांकडून कौतुक व्हायचे. महानगरपालिकेच्या शाळेत न्याहरी मिळत असे, त्यामुळे विद्यार्थ्यांचे जास्त लक्ष अभ्यासासोबतच  न्याहरीकडेही असे. महानगरपालिकेची शाळा सातवीपर्यंत असल्यामुळे पुढचे शिक्षण कसे घ्यायचे ? हा प्रश्न देखील उभा होता. आठवी ते दहावीपर्यंतचे शिक्षण आदर्श विद्या मंदिर शाळेत झाले. शाळेचे कपडे मामाकडून, दप्तर भावाचे, पुस्तके संस्थेमधून अशा सहकाऱ्यातून दहावीपर्यंत शिक्षण पूर्ण केले. दहावीनंतर तीन वर्षे फुलांचा व्यवसाय हा करतच होतो. 

मी आणि माझा भाऊ ड्युक्स कंपनीत कामाला जात. दिवसाला १५ रुपये मिळत आणि जास्त कामाचे अधिक पैसे मिळत असे. लाकडाचे खोके उचलण्याचे ते काम होते. आठ दिवस काम केल्यानंतर आम्हाला साखरेची ५० किलोची गोणी उचलण्यास सांगितली, त्या लहान वयात  आमच्याकडून ती गोणी उचललणे शक्य नव्हते. आम्ही ती गोणी टाकून घरी आलो. त्या दिवसाचे पैसेही घेतले नाही. तो घडलेला प्रकार आम्ही आईला सांगितला. ते माझे पहिले काम...    
 
आमच्या घरी वर्तमानपत्र येत. त्यातल्या जाहिराती मी वाचत असे. घरकामासाठी घरगडी पाहिजे, मानधन रुपये ३००/-   अशी जाहिरात वाचण्यात आली. घरगडी म्हणजे काय ? हे माहित नसताना मी तिथे जाऊन ते काम करायचे ठरवले.  त्या कामात गाडी धुणे, भांडी घासणे, कार्यालयीन कामे, इ. जी कामे सांगितली जायची, ती मी करत. माझ्या मनाला त्यातील काही कामे न पटल्याने  एक महिना काम करून मानधन घेतले आणि  ते काम सोडले.  त्यानंतर नेरूळला औषध निर्मितीच्या कंपनीत ३२ रुपये रोजंदारीवर तीन महिने  काम केले. नंतर  तुर्भे येथील केमिकल कंपनीत आठ तासांची नोकरी मिळाली. मदतनीस (हेल्पर) म्हणून ती नोकरी होती. कंपनीची गाडी न्यायला आणि सोडायला येत असे. मालाची ने-आण करण्यासोबत सांगितलेल्या कामात मदत करणे, असे कामाचे स्वरूप होते.

मी ज्या वस्तीत गजरे विकायचो, तिथे लहान मुलांना अभ्यास,गाणी, गोष्ट, इ.  शिकवत.  ते करत असताना एका व्यक्तीने मला पाहिले आणि माझी विचारपूस केली. तु काम करशील का ? असे सहज त्याने विचारले आणि मी त्याला होकार दिला. १९९६ ला मी प्रथम स्वयंसेवी संस्थेत कामाला लागलो. माझी ग्रंथालय प्रकल्पापासून (लायब्ररी प्रोजेक्ट) कामाला सुरुवात झाली.  वस्तीपातळीवर ‘सावित्रीबाई फुले वाचनालय’  सुरु करण्यात आले. त्यानंतर बालवाडी प्रकल्पात मला घेण्यात आले. मुंबईतील वस्त्यांमध्ये बालवाड्या सुरु करायच्या होत्या. ही बालवाडी, घरी, मंडळे, समाज मंदिर, आदी ठिकाणी सुरु असायची. वस्तीतील शिक्षिका ही आजुबाजूच्या मुलांना घेऊन बालवाडी सुरु करायची. टीम लिडर वस्तीचा सर्व्हे, शिक्षकांचे प्रशिक्षण, आदी बाबी कराव्या लागत.  बालवाडीमध्ये मुलांना अंक-अक्षर ओळख, गोष्टी, गाणी, खेळ, आदी बाबी घेतल्या जायच्या.  मी  मुंबईतल्या ४० बालवाड्यांचा को-ऑर्डीनेटर होतो.  त्यानंतर मुंबईत ‘बालसखी’ प्रकल्प केला. १९९८ ला ‘बालसखी’च्या कामानिमित्त अलिबागला जाणे झाले. बालसखी उपक्रम म्हणजे जे विद्यार्थी गणित आणि भाषा विषयात मागे आहेत, त्यांच्यात सुधारणा घडवून प्रगत करणे होय. त्यांना अंक-अक्षर ओळख, बेरीज-वजाबाकी-भागाकार-गुणाकार, आदी अभ्यास विद्यार्थ्यांकडून  करुन घेतला जाता असे. शंभर गावांमध्ये बालसखी उपक्रमासाठी फिरलो. उपक्रमाचा उद्देश, लोकांशी गाठी-भेटी आणि चर्चा, पालकांशी संवाद, शासकीय संस्थांशी संपर्क,  इ. बाबी दैनंदिन व्हायच्या. शिक्षण अधिकाऱ्यांची भेट घेऊन त्यांना शैक्षणिक उपक्रमाबाबत सांगितले, की ते सकारात्मक प्रतिसाद देत असत. 

बालसखी उपक्रमानिमित्त मी आणि माझा सहकारी एकत्र राहत होतो. पहिल्यांदाच मुंबईबाहेरचा प्रवास होता. आम्ही स्वत: जेवण बनवायचो, कधी-कधी ते  कच्चे रहायचे. पण स्वत: जेवण बनवायची मजा काही औरच होती. दुपारचे जेवण आमचे बाहेरच होत असे. माझा सहकारी हा वरिष्ठ असल्यामुळे त्यांचे कामानिमित्त संशोधन आणि अभ्यास सुरु असायचे. जिल्हापरिषद कार्यालय, ग्रामपंचायत, गट संमेलन, वरिष्ठ कार्यकारी अधिकारी, शिक्षण अधिकारी, आदींच्या भेटी पुर्वनियोजित करून त्यांना भेटत असू. त्यांना अंक-गणित आणि भाषा  अभ्यासासंदर्भातील खेळ सादर करण्याची जबाबदारी माझ्यावर होती. मी अलिबागला उपक्रमासाठी टीम तयार केली. मी टीम लिडर आणि संचाराकाना त्यांची जबाबदारी पटवणे, कामांची कार्यपद्धती समजावणे, विद्यार्थ्यांना शिकवण्याची पद्धत, आदी बाबी सांगत असे. त्यांना काही समस्या आल्यास त्यांच्या सोबत मी शाळेत जात असे. अलिबागच्या आदिवासी पाड्यातील बालवाडीतल्या मुलांना अंघोळ घालणे, दात घासणे, आदी गोष्टी करून शिक्षकांना स्वच्छतेचे महत्व समजावून सांगितले. आदिवासी लोकांची भाषा वेगळी असल्यामुळे त्यांच्यातील एका मुलाला  टीम लिडर केले आणि त्याला बालसखी उपक्रम आदिवासींना  समजावून सांगण्यास सांगितला. अलिबाग नगरपरिषदेने  बालसखी उपक्रमाला चांगला प्रतिसाद दिला होता.

कामानिमित्त प्रवास जास्त प्रमाणावर होत असे. कधी-कधी जेवण होत नसल्याने मला आरोग्याच्या समस्या उध्दभवू लागल्या. माझ्या शरीरात जीवनसत्वाची कमतरता असल्यामुळे मी आजारी पडलो.  गावातील लोकांनी माझी विचारपूस केली आणि त्यांनी मला मांत्रिकाकडे नेले. गावकऱ्याने मांत्रिकाला सांगितले की, ‘ मुलांना शिकवण्याचे चांगले काम करतात. बघा...यांना काय झालं आहे. घरचे इथे यांचे कोणीही नाही.’ माझ्याबद्दल माहिती सांगितल्यानंतर त्यांनी मला मांत्रिकासमोर बसवले. मांत्रिकाने सुरुवातीला माझे केस पकडले आणि मला मारले आणि म्हणाला, ‘बोल का सतवतोस याला बोल सांग...लवकर !’ मला माहित होतं की तो मला मारतोय. पण माझ्यातील अशक्तपणामुळे मी काहीच बोलू शकत नव्हतो. मांत्रिकाने धूर केल्याने मी गोल-गोल फिरायला लागलो.   मांत्रिक म्हणाला, ‘बघ आला...बघ आला. सांग आता का सातवतोस याला ? आता का शांत आहेस ? बोल तु .याला सोडलं नाहीस तर गाठ माझ्याशी आहे.’  त्यानंतर मांत्रिकाने लिंबू कापलं, नारळ आणि पानं आणली. नंतर माझे केस धरून  झाडूने मारलं. मला अंगारा दिला आणि गावकऱ्यांनी मला घरी आणले. मी शुद्धीवर आल्यावर घरच्यांना फोन लावण्यास सांगितला. दुसऱ्या दिवशी डॉक्टरांकडे गेलो. डॉक्टरांनी इंजेक्शन आणि औषधे दिली आणि न्याहरी  केल्यानंतर मला बरं वाटलं.  त्यानंतर मी घरी आलो. स्वत:च्या आरोग्याकडे लक्ष देणे आवश्यक आहे. आरोग्य चांगले तर आपण सर्व गोष्टी करू शकतो, असे मला वाटते. आजही  ही आठवण माझ्या लक्षात आहे.

२००६ ला पेण, उरण पनवेल, रत्नागिरी आणि खामगाव या विभागात प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनचे काम चांगल्या पद्धतीने सुरु झाले. माझ्यासोबत दोन सहकारी देखील होते. पनवेल आणि अलिबागमध्ये टीम लिडर म्हणून माझ्यावर जबाबदारी होती.  त्यासोबत संस्थेची इतर कामांमध्ये देखील सहभाग असायचा. अलिबागच्या शासकीय शाळांमध्ये आणि अधिकाऱ्यांसोबत कामाच्या माध्यमातून चांगले संबध प्रस्थापित झाले. त्यामुळे अलिबागच्या शाळांमध्ये कॉम्प्युटरचे शिक्षण घेण्यासाठी मी पुढाकार घेतला आणि तो कार्यक्रम  अद्यापपर्यंत सुरु आहे.  गावात गटशिक्षण अधिकारी, विस्तार अधिकारी, केंद्र प्रमुख, आदी लोकांशी ओळख होऊन काम कुठल्या ठिकाणी होणे गरजेचे आहे, याची कल्पना स्पष्ट होत गेली. एखादी गोष्ट योग्य पद्धतीने पटवून दिली, तर ते सकारात्मक प्रतिसाद देऊन त्याची अंमलबजावणी करतात. शासकीय काम करताना वरिष्ठ कार्यकारी अधिकाऱ्यांनी (CEO)  सहाय्य केले.  वरिष्ठ कार्यकारी अधिकाऱ्यांसोबत जास्त काळ काम केले.  ‘सरकारी काम चार दिवस थांब’ याचा  प्रत्यय शासकीय काम करताना वेळोवेळी येत असे. मी निवडलेले टीम लिडर  आजही संस्थेत चांगले प्रतिनिधीत्व करत आहे. 

सरकारी आणि खाजगी शाळांचे करार तयार करून विविध शाळांमध्ये देण्यात येतात.  करारातील नमूद केलेले मुद्दे, स्वत:ची जबाबदारी, शाळेचे दायित्व, आर्थिक बाबी, वेगवेगळ्या प्रकारची पत्रे, इ. गोष्टींची अंमलबजावणी वेळच्यावेळी करून घेणे आवश्यक आहे.  विद्यार्थ्यांचा उपस्थिती पट बनवणे, अहवाल (रिपोर्ट) तयार करणे त्यासोबतच शाळा आणि संबंधित व्यक्तीकडे  कामासंदर्भात योग्य वेळी पाठपुरावा करणे देखील महत्वाचे आहे. काम करताना व्यवहारिक ज्ञान, शाळेचे करार (School Agreement) बनवणे , अधिकाऱ्यांना पत्र लिहणे, संबंधित विषयातील मुद्दे व भाषा, कार्यानुभवाचा विविध कामांमध्ये उपयोग, आदी गोष्टी शिकता आल्या. मी इंडिया डिजीटल इनक्लुजन उपक्रमाची जबाबदारी देखील स्वीकारली होती.  वरिष्ठ लोकांशी संवाद साधणे, धाडसीपणा, संयम, वेगळ्या दृष्टीकोनातून विचार करणे, स्वत:शी व कामाशी प्रामाणिक राहणे, कामाचा पाठपुरावा करणे, आदी गुण काम करणाऱ्या सहकाऱ्यांकडून शिकलो. कामाच्या संदर्भात ‘प्रशिक्षण’  वेळोवेळी घेणे महत्वाचे आहे, त्यामुळे वेगवेगळ्या आणि बदललेल्या गोष्टी समजून नवीन बाबी समजतात. 


आईसमोर काम करताना तिच्या मनात विचार येत असेल की, ‘जो मुलगा गजरे बनवायचा तो  कॉम्प्युटरवर किती वेगाने काम करतो.’  माझ्याकडे ती कुतूहलाने बघत असते.  मी जेव्हा घराच्या बाहेर कामानिमित्त जातो, तेव्हा ती भारावून जाते. काही तरी महत्वाचे काम असेल, असे तिला वाटते. कामाव्यतिरिक्त कुटुंबाची जबाबदारी देखील माझ्यावर आहे. लग्न झाल्यामुळे पत्नीला देखील वेळ देतो. पत्नी समजूतदार आहे.  पदवीचे शिक्षण पूर्ण करण्यावरही  लक्ष केंद्रित आहे. बातम्या बघणे, जुनी गाणी ऐकणे, क्रिकेट खेळणे आवडते. समाजात जे घडतं, त्याची माहिती मिळवण्याकडे माझा कल असतो . कामाशी  संलग्न गोष्टी शिकायला आवडतात. वर्तमान आणि अद्ययावत ज्ञान घेण्यात रस असतो. अवांतर वेळ मिळाल्यावर भविष्याचे नियोजन कसे करता येईल, याचा विचार करतो. 

Monday, 8 June 2015

I am not afraid of dreaming big!


Vikram Lokhande

Is Vikram Madhukar Lokhande like any other boy or does he aspire to have a better future for himself and others like him? 

His story is a motivation for all of us irrespective of the social or economic background which we hail from.

Vikram Madhukar Lokhande is a 20 year old boy, who lost his father in 2008 when he was just 11. He has 3 sisters and 1 brother and a mother who is a hard working domestic helper.
Vikram was a student of Ekveera Vidyalaya and joined PIF’s Student Enrichment Program from his 10th standard. His hard work and the excellent guidance he received under this program helped him secure 78% in his SSC! Vikram says his fear of studies no longer exists thanks to the emotional support given by the teachers (fellows) of the program.

Vikram’s brother gave up his studies at an early age so that he could take up a job and look after his family’s needs. “He sacrificed his studies so that I could study ahead. I owe my success to my dear brother.”

Vikram wanted to study ahead but also wanted to share in the financial responsibilities at home. And so, the organization counseled him about acquiring vocational skills and also helped him get admission in Swami Vivekananda Technical College. Vikram was always inclined towards the world of Information Technology. Hence when he was supported financially to enroll in the Computer Techniques Course (Vocational) it was like a dream come true for him! And he went on to prove his passion for this field by securing a highly commendable 88% and ranking second in his institution!

Soon after his success, Vikram was already building a path further. He was very keen on pursuing his education by doing a Computer Techniques course from  Bharati Vidyapeeth, Kharghar and with it take up a part time job to support his family.
Being financially handicapped, Vikram’s mother was finding it very difficult to help her son with the necessary fees for his next academic step. Vikram went through a lot of struggles, debating about his choice to study ahead. He was left with no money, big dreams to achieve but all this along with a lot of determination. And this was the only aspect that kept him going.

Vikram looked through a lot of options to get the necessary funds but to no avail. His mother couldn’t see her son’s dreams come to an end and so started asking people for help. Somehow she managed to collect the amount needed and got her son admitted into the course he wanted. She has now increased her working hours, working in many more houses, struggling hard throughout the day in order to pay back the money she borrowed. “My mother is my ideal, there is no other person I respect as much as I adore this lady. She understands me, lives each day just to help me achieve my dreams. I love her so much”, says a teary Vikram.

Keeping up with his family’s expectations and living up to his mother’s sacrifices, Vikram stood second in his Computer Techniques, Diploma course, 2nd year and is now looking forward to year 3.
Vikram is very thankful to Pratham InfoTech Foundation for giving a strong foundation and purpose to his future and also his mother and brother for all the sacrifices they make each day to see him excel in life. It is not just love for a son but also respect for his determination, admiration of his intellect and awe of his zeal that draws people towards him and pushes them to do something to help this young lad. Vikram is now more confident about himself and his choice.

Vikram also nourishes a dream for the future where he would help students who need guidance and support, like he got, when he needed it the most.


We wish Vikram the very best for his future and may his dreams come true. May you be an inspiration to many more youngsters and make a difference to people’s lives.