Saturday, 25 July 2015

जीवन में लोगों को प्रोत्साहन मिलते रहना चाहिए - निलेश पाटिल

Nilesh Patil

निलेश पाटिल मूल रूप से महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले से संबंध रखतें है. उनके परिवार में उनकी पत्नि, माता-पिता और 2 भाई भी हैं. निलेश के पिता वन विभाग में कार्य करते है, जिनका समय- समय पर राज्य के अलग- अलग जगहों पर स्थानान्तरण होता रहता है. ऐसे में निलेश की प्रारंभिक शिक्षा से 10वी तक की पढ़ाई मुरुड, इंदापूर और बोर्ली से, तथा 11वी और 12वी की शिक्षा पेण (रायगढ़) से पूरी हुई है. इसके साथ ही एम.एस.सी.आई.टी और बीए आर्ट्स से ग्रेजुएशन पूरा करने वाले निलेश का उद्देश्य, बीएड और डीएड भी करने का है, लेकिन कुछ कारणों से उन्हें यह मौका नहीं मिल पा रहा है.

पिता की अकेली जॉब के कारण 12वी के बाद निलेश ने घर में ही बच्चों को कोचिंग देना शुरू कर दिया था. इसके बाद जैसे ही उन्होंने एम.एस.सी.आई.टी में दाखिला लिया वैसे ही महाराष्ट्र के पेण में प्रथम इंफोटेक फाउंडेशन के साथ कार्य की शुरुआत भी कर दी. कुछ सालों तक यहाँ काम करने के बाद उन्हें सूरत में इसी कार्य की बुनियाद रखने की जिम्मेदारी दी गई. घर वालों की मर्जी के विरुद्ध निलेश ने इस कार्य के लिए हामी भर दी.

निलेश के लिए पूरी तरह से नई शुरुआत थी. नया शहर, नए लोग, नई भाषा सब कुछ बदल गया. निलेश की मातृभाषा मराठी है, परन्तु उन्हें गुजराती प्रदेश में, हिंदी स्कूल में कार्य की जिम्मेदारियां सौंपी गई. चुनौतियाँ कदम- कदम पर निलेश की राह तक रही थी. पहले दिन निलेश संचारकों को प्रशिक्षण देना चाहते थे, लेकिन भाषा के कारण असहाय होकर अच्छे से ट्रेनिंग नहीं कर पाए. निलेश बताते है कि “मुझे विषय का ज्ञान था, लेकिन मुझे भाषा का ज्ञान नहीं था. इसलिए मैंने सबसे माफ़ी मांगी और अगले दिन मिलने की गुजारिश की. पूरी रात मैंने हिंदी में अभ्यास किया और अगले दिन सफल रहा.”

निलेश को कई लोगों ने प्रोत्साहित किया था, जिसकी बदौलत वो अगले दिन सफलतापूर्वक प्रशिक्षण कर सके. निलेश मानते है कि “हर छोटी- छोटी उपलब्धियों के लिए समय- समय पर प्रोत्साहन देना जरुरी है. अगर कोई व्यक्ति कुछ नहीं कर पा रहा है तो, उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देनी चाहिए. अक्सर कार्यस्थलों पर इस बात की कमी देखने मिलती है. लेकिन जिस तरह कार्य जरुरी है उसी तरह, लोगों का मनोबल भी जरुरी है.” इस बीच निलेश ने वहां रहते हुए न केवल हिंदी भाषा पर बल्कि गुजराती भाषा पर भी महारत हासिल की है.”

पिछले 8 सालों से प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन के साथ कार्य कर रहे निलेश स्वाबलंबी है. किसी के सामने बोलना, मनाना, कार्य से सम्बंधित अफसरों से बातें करना, टीम को संभालना उनकी जवाबदारियाँ है. न केवल ऑफिस के बाहर; बल्कि ऑफिस में टीम को कार्य का व्योरा देना, ट्रेनिंग लेना; ट्रेनिंग देना. काम करवाना, बच्चों को ट्रेनिंग से फायदा दिलवाना भी उनकी जवाबदारी है. कार्य की शुरुआत में संचारक (टीचर) के रूप में, पेण में निलेश एक स्कूल में 350 बच्चों के बीच काम किया करते थे. 4 महीने तक काम करने के बाद, बतौर टीमलीडर उन्होंने 7 संचारकों, 8 स्कूलों में करीब 2,000 बच्चों के बीच में काम किया. न केवल पेण में बल्कि रोहा और माथेरान में भी क्रमशः 6 स्कूलों में 700 बच्चों और एक स्कूल 300 बच्चों के बीच कार्य किया. फिलहाल वो सूरत में डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर है, जिनके साथ 34 लोगों की टीम है, जो 31 केन्द्रों में, करीब 9,445 बच्चों के बीच में कार्य कर रहें है.


अपने पिता को आदर्श मानने वाले निलेश कहते है कि “फिलहाल हम डिजिटल लिट्रेसी और लाइफ स्किल प्रोग्राम चला रहें है. लेकिन ऐसे पाठ्यक्रम का होना जरुरी है जो, बच्चों को इस प्रतिद्वंदिता में स्थिर रख सकें.” साथ ही वो मानते है कि “जिस तरह मुझे जीवन में लोगों ने बढ़ावा दिया है, ठीक उसी तरह मैं भी लोगों का मनोबल बढ़ते देखना चाहता हूँ. और इसके लिए जो भी हो सकेगा मैं उतना प्रयत्न करने के लिए तैयार हूँ.”

Saturday, 18 July 2015

“Working as a Sancharak is the best thing that could happen to me”- Hemangini Kedar

Hemangini Kedar

After completing her H.S.C. Hemangini went on to do an ITI course in Electronics and Tele Communication. Thereafter she worked for a year with Vital, an IT company based in Ghansoli.

Hemangini was interested in computers and so did a basic course but said she was never satisfied with the knowledge she had gained. She got married in 2013 and very soon her mother helped her get a job in a Municipal school as a computer teacher for Standard 5, 6 and 7. She liked her job and began developing interest in teaching along with her already born interest in Information Technology. 

Hemangini lives with her husband who also works in a private firm in Andheri and is into hard ware and networking. The urge to increase her knowledge and build her confidence left Hemangini in constant search for an opportunity. And as soon as she came across pamphlets on the IDI program’s Digital Literacy Course (DLC) being distributed in her area, Hemangini grabbed it before it was gone. She immediately got herself enrolled in the course at Oxford English High School, Thane and began loving it.

When asked how the course helped her, Hemangini says, “I am glad I joined the course. I am now confident in what I do. I had no clue about how to use the internet. Now I know a lot. The soft skill workshops that are inbuilt in the course were very helpful and have played a big role in making me a good teacher today”. Hemangini does not have a computer at her place and so whenever she gets a chance she runs to her parents place to spend some time on the computer, surfing the internet and practicing on excel sheets.

Living at a rented place is expensive these days along with the increasing prices of almost everything around and so Hemangini was in search of some extra income. Keeping this in mind and also her skill set, teaching experience and zeal to work hard, Hemangini  was  selected as a Sancharak in the same school where she completed the DLC course. She continues to teach in the Municipal school that she was working in earlier in the mornings along with teaching at the center as a Sancharak during the evenings.

“Working as a Sancharak is the best thing that could happen to me . It keeps me in touch with what I learnt and also makes me learn new things each day, things I did not even know existed. It has taken my teaching practices to another level all together. I am glad that I could not only learn all this but that I can also teach others what I now know”, says Hemangini with a smile.

Saturday, 11 July 2015

Happy to be digitally literate.......

Sheela Rane

The only reason Sheela Rane, used a computer was to play games. “I had done a typing course but that was on a type writer”, says Sheela. 

She had never learnt anything about computers before and always wanted to do some course in it but found the fees too expensive. After completing her H.S.C. Sheela immediately got married and very soon was expecting her first child and so never even got a chance to get a job somewhere.

Sheela was blessed with a supportive husband who always encouraged her to study further. After a neighbour lady informed her of the Digital Literacy Course (DLC)  that had just begun at Samarth Vidyalay in their community in Kalwa, Sheela was happy and went on to enrol herself. “My husband’s constant encouragement made me take up the DLC course. My husband does not earn that much. He takes care of all our needs. My brother in law, younger brother and sister also live with us. I did not want to burden him with my fees. But the fees here are very nominal, almost free”, says Sheela with a smile.

She was very happy with what she learnt in the course and also liked the teaching staff and methods used. After completing the course Sheela was on an internship program. She was so good at her job that she got selected as a sancharak at Adarsh Vidyalay within 15 days itself. “I love my job where I have to teach as well as keep learning more all the time. I get to spend a lot of time on the computer, and I like it. The course has helped a lot. I have to teach the students whatever I learnt in the course. The other teachers in that school are very helpful. And I like learning new things from them as well”, says a thankful Sheela.

Sheela recalls that she did not have many friends and after marriage, she had stopped going out too. But now she has made so many friends during the course that even though the course has ended, they still keep in touch and meet up regularly.

“I have a little daughter and am happy with the timings of this job. It helps me spend time with my family as well as do what I love doing... and that is spreading digital literacy”.


Wednesday, 8 July 2015

आयुष्यातील संघर्षमय अनुभवाने जडण-घडण केली. - छाया आंबेरकर

Chaaya Amberkar

रोपट्याची वाढ होताना त्याला थंडी,वारा, ऊन, पाऊस यांचा सामना करून ताठ उभे रहावे लागते. हा सामना सुरु असताना अचानक मायेची ऊब साथ सोडून जाते. अशा परिस्थितीत मन घट्ट करुन कुटुंबाचा ‘आधारवड’ आणि सदस्य भक्कमपणे उभे राहतात आणि आपली मार्गक्रमणा अखंडपणे करतात. वर्तमानातून भविष्याकडे प्रवास  करताना संघर्ष येतो. पण सभोवतालच्या प्रसंगातून लक्ष विचलित न होता  एकाग्र चित्ताने ध्येयाकडे  वाटचाल करणे, हे कौतुकास्पद म्हणावे लागेल. या तर जाणून घेऊया  संघर्षमय उर्जेचा ‘छाया’शील  प्रवास...  

रत्नागिरी जिल्ह्यातील  गावडे आंबेरी खारवी वाडा गावात छायाचे लहानपण गेले. पहिली ते दहावीचे शिक्षण गावात झाले.वडिलांचा मासेमारीचा व्यवसाय आणि आईकडे घराची जबाबदारी होती. आई-वडील, छाया,मोठी बहिण व लहान भाऊ असे पंचकोनी कुटुंब.  

गावातल्या जिल्हा परिषदेच्या शाळेत पहिली ते सातवीपर्यंत छायाचे शिक्षण झाले. त्यानंतर तिने गावातल्याच विश्वेश्वर विद्यामंदिर शाळेत  आठवी ते दहावीचे शिक्षण पुर्ण केले.  पहिली ते नववीचे शिक्षण व्यवस्थित झाले. दहावीत असताना आई आजारी पडल्यामुळे घरातले अर्थकारण आईकडे केंद्रित झाले. तिला कर्करोगाचे निदान झाल्याने कुटुंब काळजीतच होते. आईच्या आजारपणामुळे वडिलांवरचा आर्थिक भार वाढत गेला. त्यामुळे मोठ्या बहिणीला शिक्षण अर्ध्यातच सोडावे लागले. त्यावेळी छायाचे आणि भावाचे शिक्षण सुरु होते. छायाने दहावीची परीक्षा दिली आणि  आई त्यांना कायमची सोडून गेली. त्यानंतर घरची जबाबदारी मोठ्या बहिणीने सांभाळली. वडिलांनी व्यवसायाकडे पुन्हा एकदा लक्ष केंद्रित केले.

छाया दुसरीत असताना तिला आंतरशालेय पसायदान स्पर्धेत द्वितीय क्रमांकाचे पारितोषिक मिळाले. छाया अभ्यासात हुशार. त्यासोबत गायनाची  आवड, लंगडी आणि  हॉलीबॉलमध्ये तिचा सहभाग असे. आंतर शालेय  जिल्हास्तरीय कबड्डी स्पर्धेच्या उपविजेत्या संघात तिला उत्कृष्ट पकड आणि चढाईसाठी पारितोषिकही  मिळाले होते.

कॉलेजमध्ये छायाला विज्ञान शाखेत प्रवेश हवा होता. परंतु  आर्थिक अडचणींमुळे तिला  ते शक्य झाले नाही. तिने कला (आर्ट्स ) शाखेची निवड केली. छायाने १२वी नंतर कार्यानुभव शिक्षक (क्राफ्ट टीचर) हा एक वर्षाचा कोर्स केला. तिचे  शालेय शिक्षण रत्नागिरी खारवी वाडा शाळेत झाले आणि कार्यानुभव शिक्षकाची पहिली नोकरीही त्याच तिला  शाळेत मिळाली. हा योगायोग  छायासाठी आनंददायी ठरला. तिने सहा महिने ते काम केले. 

रत्नागिरीमध्ये २००८ ला  प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनमार्फत संचारक (कॉम्प्युटर टीचर ) पदांसाठीची जाहिरात छायाच्या मावशीच्या मुलाने वृत्तपत्रामध्ये वाचली. त्यासंदर्भातील माहिती घेऊन छायाने तिथे मुलाखती दिली. त्यानंतर छायाला  प्रशिक्षणासाठी बोलवून   संचारक पदासाठी तिची निवड करण्यात आली.

शाळेतील मुलांसमोर बोलण्याचा अनुभव छायाला नवीनच होता.  एम.एस.सी.आय.टी.चे  शिक्षण झाले असले, तरी  कॉम्प्युटर शिकवण्याचा अनुभव छायाला नव्हता. सुरुवातीला विद्यार्थ्यांना शिकवण्यात कमी-जास्त व्हायचे. कॉम्प्युटर प्रोजेक्टची तयारी स्वत: करून त्यानंतर टीम लिडरकडून छाया समजावून घेत. त्यानंतर ती विद्यार्थ्यांना शिकवत.  सुरुवातीला प्रोजेक्ट कठीण गेले त्यानंतर सराव झाला. कालांतराने शिकवण्यात आनंद वाटू लागला आणि विद्यार्थीही शिकवण्यात रस घेऊ लागले. विद्यार्थ्यांना शिकवताना एक वेगळ्या प्रकाराचा आत्मविश्वास छायामध्ये निर्माण झाला आणि तिच्या  व्यक्तिमत्वात बदल होत गेला. हे होत असताना...एका बाजूला तिचे आर्ट्सचे द्वितीय वर्षाचे (पदवी) शिक्षणही सुरु होते. सकाळी कॉलेज... त्यानंतर ११.००  ते ५.०० या वेळेत शाळेत विद्यार्थ्यांना कॉम्प्युटर शिक्षण. छायाने काम करता-करता कला शाखेची पदवीही  संपादन केली. त्यानंतर तिने एम. ए. चे (इतिहास)  शिक्षण सुरु केले.

संचारक म्हणून साडेचार वर्षे काम केल्यानंतर छायाला ‘टीम लिडर’ करण्यात आले. टीम लिडर म्हणजे त्या व्यक्तीकडे आठ ते दहा किंवा त्यापेक्षा जास्त शाळांची जबाबदारी असते. शाळेतल्या विद्यार्थ्यांची उपस्थिती, अभ्यासक्रमाची वेळेनुसार अंमलबजावणी, परीक्षेची तयारी आणि निकाल, डेटा रिपोर्टिंग (सर्व कामकाजाचा अहवाल), मुख्याध्यापकांशी चर्चा, शाळेच्या संचालकांशी बैठक, संचारकांचे प्रशिक्षण,  विद्यार्थ्यांच्या शुल्कासंदर्भातील काम, कॉम्प्युटर हार्ड वेअर संदर्भातील कामे अशा वेगवेगळ्या जबाबदाऱ्या छायाने स्वीकाररुन पूर्ण केल्या.

Chaaya training her team

      ‘माझी जडणघडण  प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनमध्ये झाल्यामुळे माझ्यातील कौशल्यांना वाव मिळाली. नोकरी करता-करता शिक्षण सुरु असले , तरीही कामाच्या निमित्ताने  अभ्यासात  कुठलाही व्यत्यय आला नाही, कारण संस्थेचे ध्येय शिक्षणाशी निगडीत आहे. संस्थेत काम करताना स्वातंत्र्य असून आपण मांडलेल्या मताला वाव आहे.’ असे छायाला वाटते.  
काम करत असताना  विविध जीवन कौशल्ये शिकता आली, त्यासोबत संधी देखील मिळाली. स्पष्टवक्तेपणा,  एखादी बाब न रागवता समजावून सांगणे, एखाद्या कामाची कृतीतून अंमलबजावणी करणे. अडचणीत असलेल्यांना लोकांना मदत करणे. स्वत:च्या  प्रगतीमध्ये सहकाऱ्यांना सामावून घेऊन त्यांना देखील आपल्यासोबत पुढे नेणे, या गुणांचा छायाला कामामध्ये उपयोग झाला. नोकरी करता- करता स्वत: शिकत असताना भावाच्या शैक्षणिक खर्चाची  जबाबदारीही  तिने स्वीकारली होती.

          रत्नागिरीच्या मुख्याधिकाऱ्यांकडे कामासंदर्भात जाणे होत असते. छायाचे काम पाहून शाळेच्या वार्षिक प्रदर्शनाला नगराध्यक्ष आणि मुख्याधिकाऱ्यांनी तिचा सत्कार केला. छाया छत्रपती शिवाजी महाराज आणि स्वातंत्र्यवीर सावरकर यांना जीवनात आदर्श मानते.

एम. ए.च्या दुसऱ्या वर्षाला असताना छायाचा प्रेमविवाह  झाला. लग्नानंतर  छायाने एम. ए.चे शिक्षण  पुर्ण केले. त्यामध्ये तिला  सासरच्यांनी फार मदत केली. एम. ए.चे शिक्षण पुर्ण झाल्यानंतर छायाने संसाराची जबाबदारी स्वीकारली.


छायाला बी. एड. करायचे असून  लेक्चरर (व्याख्याता) होण्याची इच्छा आहे ! विद्यार्थ्यांना कॉम्प्युटर शिकवणारी छाया भविष्यात कोणत्या विषयाचे लेक्चर देणार, हे पाहणे औत्सुक्याचे ठरेल. 

Saturday, 4 July 2015

लहानपणापासून ‘नेतृत्वशील’ असल्यामुळे आव्हाने स्वीकारली. - अर्चना यादव


Archana Yadav

प्रत्येक यशस्वी पुरुषामागे स्त्री असते, असे म्हटले जाते. परंतु एका नेतृत्वशील स्त्री मागे तिचा पती आणि मुलगा असतो, हे कधी ऐकले आहे का ? हो, हे खरं आहे. लग्नानंतर नवीन आयुष्याचा प्रवास ...मुलाचे संगोपन... नोकरी आणि कुटुंबाची जबाबदारी...पतीची साथ या सर्वांविषयी  विविध पैलू उलगडताना जाणीव झाली ती धाडसी स्त्रीत्वाची...

माझा जन्म, शालेय शिक्षण आणि महाविद्यालयीन शिक्षण पुण्यातलेच. वडिल किर्लोस्कर कंपनीत नोकरीला होते आणि आई घरातली जबाबदारी पार पाडत होती.  घरात आई-वडिल आणि माझ्यासह दोन बहिणी असे आमचे पंचकोनी कुटुंब. लग्नानंतर नाशिकच्या सिन्नर गावात दोन वर्षे त्यानंतर दोन वर्षे पुण्यात आणि नंतर नाशिकला स्थायिक झालो.

शालेय जीवनात मी अभ्यासात चांगली होते. त्यासोबत मला नृत्य आणि खेळाची आवड होती. मी गोळा फेक आणि कबड्डीमध्ये शालेय स्तरावर आणि राज्यस्तरीय क्रीडा स्पर्धांमध्ये भाग घेत असत. माझे बी.एस.सी.पदवीपर्यंत शिक्षण झाले . नंतर लग्न झाले. त्यानंतर मी दिरांच्या मेडिकल स्टोअर्समध्ये दोन वर्षे काम केले. नंतर शालेय विद्यार्थ्यांची इंग्रजी, गणित आणि विज्ञान विषयांची शिकवणी (ट्युशन) दोन वर्षे घेतली. माझ्याकडे इयत्ता पाचवी ते दहावीचे विद्यार्थी शिकवणीसाठी येत असतं.

माझ्या पतीचे शिक्षण अभियांत्रिकीमध्ये मुंबईत  झाले. त्यांच्या मित्राने ‘कॉम्प्युटर टीचर’विषयी विचारणा केली.  २००५ ला विद्यार्थ्यांची शिकवणी सुरु असताना जाजू शाळेत मला ‘कॉम्प्युटर टीचर’ म्हणून नोकरीसाठी विचारणा करण्यात आली. कॉम्प्युटरविषयी कुतूहल आणि वेगळेपण वाटल्यामुळे  संगणक शिक्षिकेची नोकरी स्वीकारली. माझ्याकडे पहिली ते चौथीच्या विद्यार्थ्यांना शिकवण्याची जबाबदारी होती. मला संगणक शिक्षणाबाबत कोणतीही कल्पना नव्हती आणि त्यासंबंधी कोणताही कोर्स झाला नव्हता. सुरुवातीला शिकवताना थोडे दडपण आले होते.  माझे पती माझ्या पाठीशी ठाम उभे होते. त्यांनी सांगितले की, ‘शिकवताना काही अडचण आल्यास मी मदत करीन’. मला शाळेतील मुखाध्यापकांनी  देखील सहाय्य केले. बी.एड. किंवा डी.एड नसल्यामुळे काही गोष्टी माहित नव्हत्या, त्या समजल्या. मी शिकवत असलेल्या अभ्यासक्रमाला विद्यार्थ्यांकडून आणि इतर शिक्षकांकडून चांगला प्रतिसाद मिळाला. त्यामुळे माझा उत्साह वाढला. तीन वर्ष मी कॉम्प्युटर टीचर म्हणून काम केले. कॉम्प्युटर टीचर प्रशिक्षणादरम्यान  नाशिकमध्येच मला ‘टीम लिडर’ होणार का ? अशी जेव्हा विचारणा करण्यात आली, तेव्हा मी क्षणाचाही विलंब न करता ‘होकार’ दिला. कॉम्प्युटर टीचरसोबत काम करणारी आणि विविध शाळांचा समन्वय साधणारी जबाबदार व्यक्ती म्हणजे टीम लिडर.

with her students


नाशिकमध्ये प्रवास म्हणजे एक दिव्यच म्हणावे लागेल. एक किंवा दीड तासाने बस...कधी रिक्षाने प्रवास  तो ही खिशाला न परवडणारा... कधी-कधी प्रवासाचा त्रास  होत असे. असे  वाटे की , जर आपल्याकडे  गाडी असती तर... कालांतराने मी गाडी घेतली आणि मग काय, दिवसभर प्रवासच प्रवास ! कारण फिरायला मला खुप आवडत असे. शाळेत मी वर्गाचे नेतृत्व (मॉनिटर) करायचे तशी लहानपणापासून माझा ओढा ‘नेतृत्व’ करण्याकडे होता.  टीम लिडर असताना मला मुख्याध्यापकांशी बोलायला भीती वाटायची. अनुभवाने आणि वयाने मोठे असणाऱ्यांशी आपण काय बोलायचे ? हा प्रश्न माझ्यासमोर असायचा. कालांतराने शिकत जाऊन बोलायला लागले आणि शिकले.  डिस्ट्रीक्ट हेड (जिल्हा प्रमुख) झाल्यापासून कामाची जबाबदारी वाढली आहे. प्रशासकीय (अडमिनीस्ट्रेशन) काम, अहवाल, शाळांच्या विश्वस्तांशी (ट्रस्टी) भेटी,  संचारक व टीम लिडर यांच्याशी चर्चा करणे आणि त्यांच्या अडचणी समजून घेऊन त्यावर उपाय काढणे, इ. बाबी कराव्या लागत.  कॉम्प्युटर अॅडेड लर्निंग (कॅल) उपक्रम, कम्युनिटी इन्फॉर्मेशन अँड ट्रेनिंग (सी.आय.टी) सेंटर, रेमिडीयल कार्यक्रम या सर्वांकडे लक्ष द्यावे लागत होते. फेलो व हार्डवेअर इंजिनीअर यासंदर्भातील समस्यावर उपाय कसा  काढावा, यावर चर्चा होत असे. मी  कॅलच्या ३६ शाळेत जवळपास १७,००० विद्यार्थ्यांसोबत काम करत असून रेमिडीयलमधील ६  शाळा आणि १ सी.आय.टी सेंटरचे नियोजन करण्यात मग्न असते. सर्वांशी काम करताना मैत्रीपूर्ण वातावरण ठेवले असून कौटुंबिक स्नेह जपला आहे. काम करताना कोणतेही दडपण नसते. जबाबदारीची जाणीव असते. निर्णय प्रक्रियेत सामावून घेतले जाते. एखादी कल्पना आली, तर त्याची अंमलबजावणी करण्यासाठी प्रोत्साहन दिले जाते. काम करताना स्वातंत्र्य दिले जाते. सुरुवातीला ऊन –पाऊस यांची तमा न बाळगतावेगवेगळ्या शाळांमध्ये फिरलो. सुरुवातीला नकार मिळाला. आता शाळा स्वत:हून दूरध्वनी करून कॉम्प्युटर कार्यक्रम घेण्याचा आग्रह धरत आहेत. एक आठवण सांगावीशी वाटते...आंतरराष्ट्रीय पातळीवर कास्ट अ स्पेल स्पर्धा आयोजित करण्यात आली होती. त्या स्पर्धेत डॉ. शालिनीताई पाटील विद्यालयातील सातवीतील विद्यार्थी निखिल बाळासाहेब पाटील याने प्रथम क्रमांक पटकावला. ही स्पर्धा वर्ल्ड नेट सर्व्हिसतर्फे घेण्यात आली होती. आपल्या कार्यक्रमामुळे त्यांना फार मदत झाली. निखिलचे वडिल रीक्षा चालक होते, ते हयात नाहीत. निखिलच्या सत्काराच्या वेळी त्याच्या आईचे डोळे पाणावले. कास्ट अ स्पेल स्पर्धेत जिंकल्यामुळे निखिलच्या कुटुंबियांना आर्थिक मदत देखील झाली. निखिलवर घेतलेल्या परीश्रमाचे चीज झाल्याचे त्याच्या आईने जेव्हा मला सांगितले, तेव्हा आपल्या कामाचे समाधान वाटले. निखिलच्या कौतुकात आमचे देखील अभिनंदन होत होते, तेव्हा आम्हालाही आनंद झाला. आमच्या कामाचे शाळेकडून  देखील कौतुक करण्यात आले.

मातोश्री सावित्रीबाई फुले विद्यालयातील वार्षिक संगणक प्रदर्शन हे शिक्षक आणि मुख्याध्यापकांना फार आवडले. शाळेने ते प्रदर्शन दुसऱ्या दिवशी देखील सुरु ठेवले  आणि तेव्हा शाळेचे विश्वस्त, संचालक व इतर मान्यवरांना प्रदर्शन दाखवण्यात आले. प्रदर्शनाच्या सादरीकरणाने मान्यवरांनी खुश होऊन शाळेला देणगी दिली  आणि संचारकांचे कौतुक केले. 
दरवर्षी प्रत्येक शाळेत वार्षिक संगणक प्रदर्शन असते. त्यामध्ये सगळ्या शाळेतून आम्ही पहिले तीन क्रमांक उत्तम प्रदर्शनासाठी निवडतो आणि त्या विद्यार्थ्यांना पारितोषिक देतो. आम्ही प्रदर्शनात सहभागी विद्यार्थ्यांना देखील भेटवस्तू देतो.  शाळेचे देखील पाच क्रमांक काढून त्या संचारकाला बक्षीस देतो. त्यामुळे शाळा, विद्यार्थी, संचारक आणि टीम लिडरचा हुरूप वाढतो. त्यांना आम्ही प्रोत्साहन देण्याचा प्रयत्न करत असून त्यांना देखील केलेल्या कामाचा आनंद मिळतो. त्यांच्यामध्ये दुपटीने काम करण्याचा उत्साह देखील संचारतो, हा माझा व्यक्तिगत अनुभव आहे. 

with family

कुटुंबाला द्यायचा तेवढा वेळ देणे शक्य होत नाही. मुलगा पहिलीत असल्यापासून मी नोकरी करते. मुलगा त्याचे काम स्वत: करतो, त्याबाबत त्याचे कौतुक करावेसे वाटते. मला माझ्या पतींने देखील समजून घेतले. मुलगा आणि पती यांनीच मला ‘अॅडजस्ट’ केले, असे म्हटल्यास काही वावगे ठरणार नाही. शुन्यातून बहुतेक गोष्टी निर्माण केल्या. नाशिकला आलो तेव्हा स्वत:चे घर देखील नव्हते. परंतु आता स्वत:चे घर असल्याचे समाधान फार आनंद देत आहे.  लग्न झाल्यानंतर सात ते आठ वर्षे संघर्ष केला. त्यामध्ये मी, पती आणि मुलगा यांचा समावेश असून त्याबाबत कोणीही कोणतीच तक्रार केली नाही. कारण त्यांना देखील परिस्थितीची जाणीव असावी, असे वाटते. ज्येष्ठ  नागरिक आणि अनाथ मुलांना मदत करण्याची माझी  इच्छा आहे.  मला शास्त्रीय भरतनाट्यम नृत्य कलेची आवड आहे.  मी शास्त्रीय भरतनाट्यमच्या तीन परीक्षा दिल्या आहेत.कधी वाटले नव्हते की मी एवढी प्रगती  करीन. माझ्या कामाने मी समाधानी असून अजून काम करत  राहण्याची इच्छा आहे.  माझा प्रवास हा असाच सुरु राहणार आहे. अजुन बराच मोठा पल्ला गाठायचा आहे ...