Thursday, 31 December 2015

नोकरीसाठी डिजिटल लिटरसी कोर्सचा फायदा होईल. - कैलास करमेळकर

Kailash Karmelkar

कैलास पनवेलच्या वाकडी गावातील तरुण. त्याने महाविद्यालयीन शिक्षण बारावीपर्यंत केले.
कैलासच्या मित्राने त्याला डिजिटल लिटरसी कोर्सची माहिती दिली. तेव्हा कैलासने कम्प्युटर कोर्ससाठी प्रवेश घेतला. वर्ड, एक्सेल, पॉवर पॉईंट, इंटरनेट, ई-मेल, विविध माहिती शोधणे, इ. बाबी कोर्समध्ये त्याला शिकता आल्या. कैलासला इंटरनेटमध्ये पर्यावरण विषयक माहिती शोधायला आवडत असे. एक्सेलमध्ये बिलांचा हिशोब कसा करायचा, हे त्याला डिजिटल लिटरसी कोर्समुळे समजले. या अगोदर ते कैलासला माहित नव्हते. 

‘नोकरीला लागल्यावर डिजिटल लिटरसी कोर्सचा फायदा होईल.’ असे कैलासला वाटते. कैलासची आई दुर्धर आजाराने घरी असल्यामुळे त्याला तिची काळजी घ्यावी लागते. तिच्यावर उपचार सुरु असून देखरेखीसाठी कैलासला आईसोबत रहावे लागते. आईच्या कारणास्तव       बारावी शिक्षणानंतर त्याने नोकरीसाठी आवेदन दिले नाही.


डिजिटल लिटरसी कोर्समध्ये कैलास पहिला आला असून तो दैनंदिन अभ्यासासाठी एक तास द्यायचा. ‘कोर्समध्ये काही अडल्यास शिक्षक सांगायचे, तसेच क्लासमधील विद्यार्थ्यांना अडचण आल्यास मी शिकवण्यास मदत करायचो.’ असा अनुभव कैलासने सांगितला. डिजिटल लिटरसी कोर्सनंतर कैलास टॅली शिकणार आहे.     

Wednesday, 30 December 2015

भारत जगत गुरु बनने की राह पर – प्रदीप कुमार

Pradeep Kumar

कृष्ण ने एक बार अर्जुन और कर्ण को पहाड़ खोदने और सोना निकाल कर गाँव वासियों में बांटने के लिए कहा. तब पहले अर्जुन ने स्वयं पहाड़ खोद- खोद कर सोना बाँटने का कार्य किया और एक समय आया की वो थक कर चूर हो गया. वहीं बाद में कर्ण ने सभी गाँव वालों को इकठ्ठा कर उन्हें खुदाई का कार्य दिया, उसका उद्देश्य था जिसको जितना सोना चाहिए इकठ्ठा करें और ले जाये. इससे एक बात समझ आती है की लोगों को निर्धारित मंजिल तक पहुचना और उन्हें काम के लिए प्रेरित करने की जिम्मेदारी आपकी होती है. ठीक इसी प्रकार की सोच दिल्ली और हरियाणा राज्य में प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन के प्रमुख प्रदीप कुमार की भी है. स्वतंत्रता सेनानी परिवार से ताल्लुख रखने वाले प्रदीप उत्तरप्रदेश के बलिया से संबंध रखतें हैं. उनके परिवार में माता- पिता, भाई, बहन, पत्नी और एक बेटी है.

शुरूआती दौर से ही प्रदीप को समाज सेवा में काफी रुझान रहा है, वो डॉक्टर बनना चाहते थे. उन्होंने जीव विज्ञान से पढ़ाई शुरू की थी, लेकिन राह उन्हें कहीं और ले गई. उन्होंने राजनीती में आने का फैसला लिया, इरादा था राजनीती के जरिये लोगों की मदद करना लेकिन उनका अनुभव विपरीत रहा. फिर उन्होंने अपने गुरु के मार्गदर्शन पर मास्टर ऑफ़ सोशल वर्क (एम्.एस.डब्ल्यू) में मास्टर्स डिग्री ग्रहण की. इसके साथ ही प्रदीप ने समाजशास्त्र (सोशियोलॉजी) और दर्शनशास्त्र (फिलासफी), विधायी कानून से स्नातक (एल.एल.बी, लॉ), बीएड और टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट उत्तीर्ण किया.

सोशल वर्क के प्रशिक्षण के बाद उन्होंने समाज सेवा के लिए कई चीजों की शुरुआत की जिसमे स्कूल, वाचनालय, कई गैर सरकारी संस्थाओं के साथ व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा नशा मुक्ति जैसे अनेक कार्यक्रम शामिल है.  वो बतातें हैं कि “ अगर कार्यक्रमों को सफलतापूर्वक चलाना है तो चीजों को सही दिशा दे कर दुसरे लोगों को संभालने देना चाहिए. ऐसे में एक ओर दूसरों को कार्य का मौका मिलता है वहीं लोगों की काबिलियत भी निखरती है. जीवन में जब आप बहुतेरे कार्य को सफलतापूर्ण अंजाम देतें हैं तो अहंकार आने का खतरा होता है, अहंकार से बचने के लिए जरुरी है कि चीजें शुरू कर उनके विकल्पों पर ध्यान दें, और जब कार्य व्यवस्थित हो जाये तो आप वहां से हट जाये दूसरों को कमान संभालने दें.”

इस बीच 2005 में प्रदीप ने प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन में बतौर डिस्ट्रिक्ट कोऑर्डिनेटर कार्य किया है. करीब छः साल यहाँ कार्य करने के बाद 2011 में प्रदीप प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन के साथ जुड़े, यहाँ उनकी जिम्मेदारी दिल्ली और हरयाणा राज्य के प्रमुख के तौर पर कार्य करने की हैं. राज्य में ई- शिक्षा को प्रोत्साहित करना, जिसमे उनका साथ देने के लिए फिलहाल 3 टीम लीडर, 2 हार्डवेयर इंजीनयर, 26 संचारक है, जो 39 शालाओं में करीब 10,000 बच्चों के बीच कार्य कर रहें हैं. अपने कार्य के बारे में प्रदीप बतातें हैं कि “प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन के साथ कार्य करना बहुत अनोखा है, क्योंकि हम आज की जरुरत के अनुरूप कंप्यूटर एजुकेशन लोगों को दे रहें है. इसके अलावा सॉफ्ट स्किल्स, ई एजुकेशन आदि विषयों पर जोर देते है क्योंकि जॉब तलाश रहे बच्चों को इन सब विषयों की जानकारी होनी जरुरी है.”


साहित्य पढ़ाने और कई विषयों पर लिखने का शौक रखने वाले प्रदीप सच्चाई एवं लगन को आदर्श मानतें हैं. वो बतातें हैं कि इनदिनों सच्चाई और लगन से कार्य करने वालों की कमी दिखाई देती हैं, कई चीज़ें सिर्फ खानापूर्ति के लिए की जा रही है जो प्रश्नात्मक है. आजादी के छः दशक बाद भी उन्हें कई जगहों पर असमानताए नज़र आती हैं, वो चाहतें हैं की “आज तक जो अधिकार लोगों को नहीं मिल पाए है, उनके लिए कुछ करना चाहिए. आज जब हम डिजिटल क्षेत्र में हैं तो लोगों को उनके अधिकारों की जानकारी देना कुछ हद तक आसान हुआ है,  लेकिन बावजूद इसके मंजिल दूर नज़र आ रही है. जहाँ तक आने वाले सालों का सवाल है भारत जगत गुरु बनने की राह पर है बस सही कार्य को सही ढंग करने की जरुरत है परिणाम बेशक अच्छा ही मिलेगा.”

Tuesday, 29 December 2015

I was given a lot of space filled with many opportunities, what more could I ask for” – Monika Solashe

Monika Solashe

Monika Solashe an efficient woman in the Pratham InfoTech Foundation (PIF) family, started off back in 2009 when she joined as a sancharak (computer instructor) in Badlapur. At once she developed a liking for her job and so, told many of her friends about it and asked them to apply too.

At that time Monika was pursuing her college education. She worked for 2 years as a sancharak and was then made Team Leader as her superiors liked her work and dedication. She was in her final year at college that year and worked hard to manage her studies along with her increased job responsibilities.

“I have learnt a lot here at PIF over the past years. Both my roles as sancharak and team leader have taught me so much. Earlier I only knew the way from my college and back home. I am now working in schools in villages that I never heard of before and have also learnt how to talk to all kinds of people specially government officials and how to maintain relations with them”, says Monika.

 She now has 11 schools to look after along with a team of 8 sancharaks working with 1400 students. She says that she finds her work very challenging and yet very fascinating. The schools she works with are all looked after by Nagar Parishad funds till now but will be soon taken over by different companies. She and her team are busy with the process of mobilization at the moment.

Monika is thankful for the regular training she receives at PIF. This helps her polish her skills and stay updated with newer teaching and management methods. She has built a good network and is quite confident about what she wants to do ahead.

“At the start I never knew I could do all this. I have learnt a lot about my capabilities and have also got a chance to try out so many new things. PIF has given me a lot of space and many opportunities”, shares Monika with a smile.

Monika is one of a kind when it comes to getting work done in an innovative way and she has proved herself many times. When she and other team leaders were asked to go and contact different companies and private schools, Monika took this to another level and used her mind to create and contact various active facebook groups and began a sort of campaign there. She got a good response and has inspired her team mates to think like wise. This is Monika, moving along with the trend.

When asked about the best part of her job, Monika says she loves the fact that she can bring about a change in the life of so many students. There were times when she has visited schools in villages where students have not even heard of a computer. It was very challenging for Monika to work with them and yet very fulfilling to see them grow. This is the only reason why she has never looked for a job elsewhere. She loves to spend time with such children and bring about awareness and learning. “They really need it and I am more than happy to help them”, says Monika.


Monday, 28 December 2015

अंगणवाडी सेविकेला कम्प्युटर कोर्स शिकणे आवश्यक ! - जयश्री केणी

Jayashree Keni

 पनवेलच्या जयश्री केणी यांचे शालेय शिक्षण दहावी. त्यानंतर त्यांचे लग्न होऊन संसार सुरु झाला. घरी पती आणि तीन मुले.  मुले मोठी झाल्यानंतर कुटुंबाला हातभार लागावा, या उद्देशाने जयश्री यांनी  अंगणवाडी सेविका म्हणून कामाला सुरुवात केली.

एका बैठकीमध्ये कम्प्युटरबद्दल माहिती मिळाली आणि त्या कम्प्युटर कोर्स शिकण्यासाठी तयार झाल्या. कम्प्युटर काय हे देखील माहित नसलेल्या जयश्री केणी यांना जगभरातील माहिती कम्प्युटरच्या माध्यमातून कशी मिळवायची हे समजले. जयश्री यांना कम्प्युटर चालू करणे, प्रकल्प तयार करणे, वृत्तपत्रातील बातमी बनवणे, इंटरनेट, इ. कम्प्युटर कोर्समध्ये शिकता आले. त्यांना टंकलेखन (टायपिंग) करणे फार आवडत.

जयश्री केणी अंगणवाडी सेविका आहेत. अंगणवाडीतील अर्ज कम्प्युटरच्या माध्यमातून भरण्यास सुरुवात होईल, तेव्हा त्यांना  कम्प्युटर कोर्सचा उपयोग होईल. ‘दैनंदिन जीवनात कम्प्युटरचा वापर व्हावा. तसेच अंगणवाडीतील सर्व शिक्षकांनी कम्प्युटर कोर्स शिकणे आवश्यक असून त्यांचा भविष्यात फायदा होईल.’ असे जयश्री यांना वाटते. अंगणवाडीतील महिला आणि त्यांच्या मुलांना कम्प्युटर शिकण्याबाबत जयश्री या मार्गदर्शन करतात. कारण भविष्यात संगणक युग येणार आहे.


अंगणवाडीमध्ये ० ते ६ वयोगटातील मुले, किशोरवयीन मुली,गरोदर आणि स्तनदा माता यांचे संगोपन करण्याचे दायित्व अंगणवाडी सेविकेवर असते.  गरोदरपणापासून ते मुल शाळेत जाण्यापर्यंत मुलाची जबाबदारीही अंगणवाडी सेविकेवर असते. अंगणवाडी सेविकेला स्वत:च्या विभागात सर्वेक्षण करुन कुपोषित बालके किशोरवयीन मुली, स्तनदा आणि गरोदर माता यांची माहिती गोळा करावी लागते. गरोदर मातेला लसीकरणासाठीचे महत्व सांगून योग्य वेळेत तिला ते घेण्यास सांगणे. ठराविक कालावधीनंतर गरोदर मातेला भेट देऊन ती घेत असलेल्या पोषक आहाराबाबत तिला मार्गदर्शन केले जाते. अंगणवाडीमध्ये मुलांना आहार, शिक्षण, खेळ, मुलांची वागणे-बोलणे-राहणे यांची कौशल्ये, इ. शिकवले जाते. आपण जशी मुले घडवू, तशी मुले घडतात. देशाची भावी पिढी घडवण्याची सुरुवात आणि जबाबदारी अंगणवाडी सेविकेवर आहे.        

Wednesday, 23 December 2015

योद्धाओं की तरह तैयार रहना जरुरी – प्रशांत त्रिपाठी

Prashant Tripathi

कई बार ऐसे उदाहरण देखने मिलतें है जिसमे लोग कुछ बनना चाहतें थे लेकिन कुछ और कार्यों में आगे निकल गए हैं. लेकिन दुसरे कार्यों में उनकी दिलचस्पी इतनी बढ़ जाती है कि जितना ज्ञान हासिल कर लो उतना कम लगता है. ऐसा ही कुछ हुआ प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन के साथ उत्तरप्रदेश के बस्ती में कार्य कर रहें प्रशांत त्रिपाठी के साथ. संयुक्त परिवार से संबंध रखने वाले प्रशांत यूँ तो जीव विज्ञान में अपना करियर बनाना चाहते थे लेकिन किन्ही कारण वश उन्हें आर्ट्स से अपना शिक्षण ग्रहण करना पड़ा, इतिहास और समाजशास्त्र का अध्ययन करते हुए उन्होंने, आई.एस.पी.सी का प्रशिक्षण पूरा किया और फिर हिंदी में मास्टर्स ऑफ़ आर्ट कि ख्याति प्राप्त की है.

बस्ती में प्रशांत के पिता सीमेंट, सरिया और अन्य बांधकाम साधन सामग्री का व्यवसाय किया करते थे. लेकिन किन्ही कारणों से उनका व्यवसाय बंद हुआ लेकिन संयुक्त परिवार के होने से ज्यादा समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ा. आर्ट्स की पढ़ाई के दौरान ही प्रशांत ने अपने चाचा के साथ मिलकर ठेकेदारी का कार्य शुरू किया. कार्य करते हुए उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की.

इस दरमियान कार्य क्षेत्र में कंप्यूटरों मांग को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कंप्यूटर का प्रशिक्षण लेना शुरू किया. प्रशिक्षण के दौरान ही उन्हें प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन के बारे में पता चला, जो बस्ती में अपना कार्य शुरू करने के प्रयास कर रहें थे. वो बतातें हैं कि “हमारे कंप्यूटर इंस्टिट्यूट में प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन से कुछ लोग आये थे जो ऐसे लोगों का चयन कर रहे थे जिन्हें कंप्यूटर में ही आगे करियर बनाना था. ऐसे में कुछ और लोगों के साथ मेरा चयन किया गया और हम सबको लखनऊ में ट्रेनिंग के लिए बुलाया गया.” ट्रेनिंग में उन्हें बहुत कुछ सीखने मिला जो की कंप्यूटर इंस्टिट्यूट में उन्हें उपरी तौर पर सिखाया गया था.

प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन की ओर से उन्हें साल 2008 में संचारक के पद पर नियुक्त किया गया था. तीन महीनों तक संचारक रहने के बाद फिर उन्हें  फेलो की भूमिका निभाने का मौका मिला, जिसमे 3 साल तक उन्होंने शालाओं में बच्चों से लेकर संचारकों के प्रशिक्षण की संपूर्ण जिम्मेदारी दी गई थी. 2011 में उन्हें बस्ती में ही टीम लीडर के लिए नियुक्त किया गया जहाँ उनका कार्य शालाओं में प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन का प्रग्राम चलाने से लेकर संचारकों को देखना, शालाओं की जरुरत पर ध्यान रखना, संधियाँ करवाना, बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान रखना, उनकी उपस्थिति आदि बातों पर ध्यान देने की थी. बतौर संचारक प्रशांत ने 2 शालाओं में 500 बच्चों के बीच कार्य कर रहें थे. फिलहाल टीम लीडर होते हुए वो अभी 7 संचारकों के साथ 7 शालाओं में करीब 3,000 बच्चों के बीच में कार्य कर रहें हैं.

कार्य के बारे में प्रशांत बतातें हैं की उन्होंने प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन में आकर बहुत कुछ सीखा है साथ ही वो बतातें हैं कि “मुझे अच्छे से इस बात का अंदाज़ा है की बाहर जो कंप्यूटर का प्रशिक्षण करवाया जाता है वो कितना अधुरा या उपरी तौर पर करवाया होता है. जब मैंने यहाँ पहली बार ट्रेनिंग ली थी उसी समय मुझे इस बात का अंदाज़ा हो गया था. इसलिए मैं यह कह सकता हूँ की जो प्रशिक्षण हम बच्चों को दे रहें हैं सौ फीसीदी अच्छा और किफायती है.”

प्रशांत बतातें है की उनकी इच्छा जीव विज्ञान में करियर बनाने की थी लेकिन वो कर नहीं पाए लेकिन कंप्यूटर प्रशिक्षण उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ है, इसलिए अब वो चाहतें हैं कि “मैं बहुत ज्यादा एडवांस लेवल का कोर्स करना चाहता हूँ ताकि कंप्यूटर के इस क्षेत्र में मैं पीछे न रह जाऊं, आने वाला समय कंप्यूटर के हिसाब से बहुत जरुरी होगा ऐसे में मुझे योद्धाओं के समान तैयार रहना जरुरी है ताकि बच्चों को अच्छे से अच्छा ज्ञान दिया जा सकें.”


Tuesday, 22 December 2015

Be bold enough to use your voice, brave enough to listen to your heart and strong enough to live the life you’ve always imagined.

Rajashree Sasane

Rajashree Sasane who hails from Airoli, Navi Mumbai, works at Pratham InfoTech Foundation (PIF). She began her journey here as a Sancharak (computer instructor) 4 years back. She was informed about this job opportunity by the former Team Leader and her then Sancharak who had seen the potential within her even when she as just  student. 

After about 3 months of working as a Sancharak, she was promoted to the post of a Team Leader as there was a vacancy for that post. She applied for this post with hesitation but then in the end, her hard work and capabilities saw her through to becoming the Team Leader of the Navi Mumbai division. She now has about 10 centres under her which include 13 schools and some 15 Sancharaks. A Team Leader is someone who looks over the working in many schools and has a team of many sancharaks under them, who teach in those schools. She has been the Team Leader for about 4 years now. 


When asked about how she likes her job, Rajashree smiled a bit and began to tell us about how she reached where she was. “Earlier, I would never stay in one job for more than 1 month. I would get bored or the pressure of the job would force me to quit. However, ever since I’ve joined PIF, I’ve found happiness in working. It never bores me. This job always keeps me on my feet. I always have something to do, some errand to run which keeps me busy. The fact that there is no dull moment in my day makes this job fun for me.”


Rajashree has also completed quite a few educational courses before having reached the position of a Team Leader. She began working after she completed her 12th standard education.  She has worked at J.J Hospital in Mumbai and also had begun working at a laboratory. However, she quit both these jobs as she was not happy there. Then, she began computer courses at PIF. After completing this course, she started working there. While working, she was encouraged to complete her education by well meaning seniors. She saw sense in this as many of friends and co-workers had completed their graduation and she felt left out that she hadn’t completed her education. And so, she enrolled to complete her B.A degree. Within three years, she completed this course and has now begun with her Post Graduation degree in Arts.


When we asked her about her future plans for her life, she smiled and proudly replied that she would like to earn a Ph.D also in a few years. And knowing Rajashree, we’re sure she will be able to fulfil this dream of hers as well. 

A family who supports what the daughter-in-law does, in India, is rare but not unusual. Rajashree is one such lucky woman who has an extremely supportive family. Knowing the demands that the job puts on her, her parents-in-law take care of her daughter while Rajashree is away at work. Earlier, she lived in a joint family with her husband’s relatives. However, a few years back, Rajashree, her husband and her daughter moved into a new home, very close to the entire family so that they could experience a sense of independence. In this way, she and her husband get to live the best of both worlds.



Her husband is also very supportive of her endeavours. He has a Pharmacy company of his own and she very proudly tells us that they have around 45 workers in that factory. In this way, Rajashree has truly found a balance between her work life and her family life.  

Finally, when we asked her about what she has learnt from working at PIF, she is quick in her response. PIF has helped her in increasing the amount of confidence that she has in herself and while talking to others. She also loves travelling and because she is a Team Leader, her job description involves her travelling from one place to another. She also helps the Sancharaks in her team and they have told her that she has helped change their lives. As she was telling us this, there was a sense of pride yet humility in her voice because she was grateful that she was useful to another in shaping their lives. Alongside all of this, working at PIF gives her a kind of freedom and happiness that she hasn’t found in any of the other jobs that she has held until now.  


Towards the end of our conversation with her, we ask her for something that she may have learnt in life and that she would like to share with us. “Masti karo, zindagi apne aap acchi ho jayegi (Enjoy life, everything will fall into place)”, she tells us simply. Truly, that is something that we should strive to live according to. Of course, with this, the hard work that she put in has made her capable of living the dreams that she had dreamed for herself.   

Monday, 21 December 2015

संघर्षाच्या कठोर परीश्रमांमधून ‘समाधान’ मिळाले. - ओमप्रकाश यादव

Omprakash Yadav

एकेकाळी तरुणाचे शिक्षण कृषी क्षेत्रातील असले आणि लग्नाच्या वेळी नोकरी नसली, तरी तरुणांची लग्न व्हायची. कारण मुलाला नोकरी लागेल, हा  विश्वास मुलीकडच्या नातेवाईकांना असायचा. अशाच कृषी क्षेत्रात अधिकारी पदावर काम करण्याची इच्छा बाळगणाऱ्या आणि बी. एस. सी. अॅग्रीकल्चरची पदवी घेतलेल्या तरुणाच्या जीवनावर टाकलेला ‘वास्तव’वादी प्रकाशझोत... 
उत्तर प्रदेशच्या बस्ती या छोट्याशा जिल्ह्यातील ओमप्रकाश यादव यांचा जन्म. वडील गावातील एका साखर कारखान्यात नोकरीला होते. आर्थिक निकषांमध्ये  कमी उत्पन्न गटात मोडणारे कुटुंब. आई-वडील,चार बहिणी आणि दोन भाऊ असा परिवार.

ओमप्रकाश यांचे १९७१ ते १९७५ साली १ ली ते ५वीपर्यंतचे शालेय शिक्षण सरकारी प्राथमिक शाळेत झाले. त्यानंतर मुंडवा येथील कन्या विकास केंद्र महाविद्यालयात बारावीपर्यंत ओमप्रकाश यांनी शिक्षण पूर्ण केले. त्यांना वडिलांनी कृषीमधील बी.एस.सी. च्या शिक्षणासाठी गोरखपूर  विद्यापीठात पाठवले. हॉस्टेलमध्ये राहून काटकसर आणि योग्य  पद्धतीने खर्च करुन ओमप्रकाश यांनी स्वत:चे शिक्षण पूर्ण केले. बी.एस.सी. अॅग्रीकल्चरच्या शिक्षणाच्या वेळी त्यांच्या वडिलांचा पगार ५०० रुपये असून त्यातील २०० रुपये ओमप्रकाश यादव यांच्या शिक्षणसाठी खर्च होत असे. १९८९ ला ओमप्रकाश यांनी बी.एस.सी. अॅग्रीकल्चरची पदवी संपादन केली.  त्यानंतर त्यांचे वडील नोकरीतून  निवृत्त झाले. कुटुंबात ओमप्रकाश यादवांचे शिक्षण झाल्यानंतर त्यांच्या आईचे अचानक निधन झाले.

वडील निवृत्त झाल्यानंतर कुटुंबाला दिनचर्या सुरु ठेवण्यासाठी आणि नोकरीसाठी ओमप्रकाश यादवांची धडपड सुरुच होती. खलिलाबादला खाजगी साखर कारखान्यात पर्यवेक्षक (सुपरवायजर) म्हणून  ओमप्रकाश यांना पहिली नोकरी मिळाली. शेती क्षेत्रात टार्गेटनूसार काही  हेक्टर ऊस लागवड करणे. त्यासाठी शेतकऱ्यांना शेतात ऊस लागवडीसाठी प्रोत्साहन देणे, ऊसाच्या शेतीसाठी लागणाऱ्या बी-बियाणे, किटकनाशके, शेतीची औषधे इ. साधनसामुग्री अनुदान स्वरुपात शेतकऱ्याला दिले जात असे. ऊसाच्या उत्पादनासाठी शेतकऱ्यांना प्रोत्साहन देणे आणि त्यांना सोयी-सुविधा उपलब्ध करुन देण्याचे दायित्व ओमप्रकाश यादव यांच्याकडे होते. त्या साखर कारखान्यात त्यांनी १ वर्ष नोकरी केली. काही अपरिहार्य कारणामुळे एका वर्षानंतर तो साखर कारखाना बंद झाला. याच कालावधीत १९९५ ला ओमप्रकाश यादव यांचे लग्न  करण्यात आले. 

रायबरेलीला सरकारचा उसरबु सुधार निगमचा शासकीय प्रकल्प आला होता. ओमप्रकाश यादव यांच्या मित्राने त्यांना बोलावले. त्या प्रकल्पात नापीक  जमिनींची उत्पादकता वाढवणे, सुधारणा करणे, जमिनीची सुपीकता वाढवणे अशा स्वरुपाचे काम होते. क्षेत्रीय अधिकारी (एरिया मॅनेजर)  पदावर सहा महिने ओमप्रकाश यादव होते.

नोकरीसाठी संघर्ष सुरुच होता. २००० साली  ओमप्रकाश यादव मुंबईला आले. मुंबईला एका व्यक्तीशी त्यांची भेट झाली. त्यांनी सांगितले की, ‘आपण विविध  शाळांमध्ये कॉम्प्युटर विषयक  अभ्यासक्रम विद्यार्थ्यांना शिकवतो.’ त्यानुसार  कॉम्प्युटर अभ्यासक्रम सुरु असलेल्या कुर्ला आणि मुलुंड येथील शाळांमध्ये  ओमप्रकाश यादव यांनी भेट दिली. त्यांनी मुंबईमध्ये तीन महिने राहून कॉम्प्युटरचे सर्वसाधारण ज्ञान, कॉम्प्युटर गेम्स, सॉफ्टवेअर्सची माहिती, इ. शिकली आणि ते  उत्तर प्रदेशला गेले.

उत्तर प्रदेशमधील अलाहाबाद येथे फेब्रुवारी, २००१ ला ‘प्रथम’ स्वयंसेवी संस्थेचा कार्यक्रम सुरु झाला. त्या कामात ओमप्रकाश यादव यांना संस्थेच्या व्यक्तीने काम करण्यास मार्गदर्शन, मदत  आणि सहाय्य केले.  बालवाडीचा ‘ब्रीज कोर्स’  कार्यक्रम ओमप्रकाश यादव आणि त्यांच्या सहकाऱ्याने मिळून सुरु केला.  ‘आम्ही तीन  वर्षापासून ते  चौदा वयापर्यंतच्या विद्यार्थ्यांचा एकत्र वर्ग घेतला. आम्हाला प्रशिक्षणातील  कार्यशाळेत कोर्सचे  विविध टप्पे,  मुद्दे आणि बाबी समजल्या. कामाचा उद्देश, कामकाजाची दिशा आणि स्वरुप शिकण्यासाठी सहा महिने लागले.’ असे ओमप्रकाश यादवांनी सांगितले. बालवाडीचा ब्रीज कोर्स कार्यक्रम २००६ सालापर्यंत १८,०००हून अधिक विद्यार्थ्यांसोबत ७५० केंद्रांमध्ये सुरु होता. त्यामध्ये बालसखी, लायब्ररी उपक्रम, रेमिडीयल क्लास, आदी वेगवेगळ्या उपक्रमांचा समावेश होता. तेव्हा ओमप्रकाश यादव ‘प्रथम’चे  झोन हेड पदावर होते. याच दरम्यान त्यांनी बी.एड.चे शिक्षणही घेतले.   

लखनऊमध्ये ऑगस्ट, २००८ वर्षात प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनचा ‘कॉम्प्युटर अॅडेड लर्निंग’ कार्यक्रम सुरु झाला. अलाहाबाद, बस्ती आणि लखनऊ येथे तीन वर्षातील अनुभवावर  ओमप्रकाश यादव यांना उत्तर प्रदेशचे प्रकल्प प्रमुख (Project Head) म्हणून नियुक्त केले.

कॉम्प्युटर अॅडेड लर्निंगचे (कॅल) काम करताना ओमप्रकाश यादवांना टीम बनवण्यापासून ते उपक्रम समजून घेण्यापर्यंत वेगवेगळ्या अडचणींना सामोरे जावे लागले. ‘लोक कामासाठी तयार व्हायचे आणि नंतर ‘नकार’ कळवायचे. काही तरुण एक महिने काम करुन सोडून जायचे. काही लोक तीन महिने काम करत आणि त्यानंतर येत नसत. लोकांना काम करण्यासाठी तयार करणे, हेच मोठे आव्हान होते.  काही कालावधीनंतर लोक स्वत:हून येण्यास तयार झाले.’ असे  ओमप्रकाश यादव सांगतात. कार्यक्रमात समाविष्ट होणारी प्रत्येक व्यक्ती नवीन असल्यामुळे सर्वांना समजून घेऊन एकसंधपणे शिकून –समजून कामांची मांडणी ओमप्रकाश यांनी केली. शाळांना भेटी देणे, समस्यांचे निराकरण करणे, फिल्ड वर्क, ट्रेनिंग, इ-मेल करुन  आलेल्या इ-मेलला प्रतिक्रिया देणे, रिपोर्टिंग,  आदींचे दायित्व ओमप्रकाश यादवांकडे होते.

‘अनुभवी लोकांनी अनेक गोष्टी शिकवल्या आणि त्यांच्याकडून विविध बाबी शिकून घेतल्या.  जेव्हा  कामाची सुरुवात केली, तेव्हा सकाळी जे काम सुरु व्हायचे, ते रात्रीपर्यंत करत असायचो. मन लावून काम करण्याची इच्छा, कठोर परिश्रम, वेळेचे व्यवस्थापन, कामाप्रती प्रामाणिकता, जबाबदारी, लोकांशी वागण्याची पद्धत, सांघिक सहकाऱ्यांशी व्यवहार, आदी गोष्टी वरिष्ठांकडून अनुभवातून शिकायला मिळाल्या.’ हा अनुभव ओमप्रकाश यादवांनी सांगितला. काही काळ गेल्यानंतर काम थोडे सोपे आणि सुटसुटीत होण्यास मदत झाली.    
  
‘नेतृत्व गुण, सांघिक कामाची भावना आणि वर्तणूक या अंगीभूत गुणांना वाव प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनमध्ये मिळाला.’ असे ओमप्रकाश यादव म्हणतात.  उत्तर प्रदेशमध्ये  ५५ केंद्रांमधील कार्य आणि ६३ शाळांमधील २०,००० हून अधिक विद्यार्थ्यांच्या  कामांचे दायित्व ओमप्रकाश यादव  यांच्याकडे आहे. 

दुर्गम भागात आणि गावच्या ठिकाणी काम करताना सुरक्षा आणि विजेचा लपंडाव अशा मुख्य समस्यांना तोंड द्यावे लागते. “ओमप्रकाश यादव प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनमध्ये जे काही अनुभवात्मक शिकले, ते त्यांना  अन्य ठिकाणी शिकता आले नसते. ज्या समर्पण  भावनेने ते काम करायचे,त्यामुळेच ते  घडत गेले.” असे त्यांच्याशी बोलताना जाणवते.

रामपूरमध्ये असताना ‘सर्व जन शिक्षण संस्था’ ही ओमप्रकाश यादव यांनी स्थापन केली असून ते संस्थेचे सचिव आहेत. शिक्षण आणि आरोग्यसंदर्भातील विविध उपक्रम संस्थेद्वारे केले  जातात. ओमप्रकाश यादव यांना दोन मुली आणि एक मुलगा आहे. मुलांचे शिक्षण व्यवस्थितपणे सुरु असून कुटुंबासाठी दिवसातून दोन ते तीन तास ते स्वतंत्रपणे देतात.

ओमप्रकाश यादव हे संघर्षाला मागे वळून बघतात... तेव्हा त्यांना समाधान वाटते, ‘कारण हे ‘समाधान’ कठोर परीश्रमांमधून निर्माण झाले आहे.’  असे ते मानतात.          



          

      


Saturday, 19 December 2015

मानसिकता बदलने की जरूरत है – शहनाज़ सिद्दीकी

दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई लेकिन फिर भी भारत का एक तबका ऐसा है जो लड़कियों के घर से बाहर निकलने पर तिरछी निगाहों से देखता है. क्या आपको भी लगता है लड़कियों को बंद दरवाजे में रहना चाहिए, क्या आप भी इस बात तरफदारी करतें हैं कि घर की जवाबदारी ही लड़कियों का परम धर्म है? तो फिर क्यों लोग आज भी लोगों का रवैया लड़कियों की ओर ऐसा हैं? सवाल यहीं ख़तम नहीं होते, एक सवाल यह भी है कि भला उन्हें करना क्या चाहिए और इसका जवाब लखनऊ में प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन के साथ कार्य कर रहीं शहनाज़ ने बखूबी दिया है. हर विचारधारा के विपरीत शहनाज़ बादलों पर राज करना चाहती हैं. उनके परिवार में माता-पिता, तीन भाई और एक बहन है.

मेडिकल के क्षेत्र से जुड़ने की ख्वाइश रखने वाली शहनाज़ ने किन्ही कारणों से बैचलर ऑफ़ आर्ट्स से पढ़ाई पूरी की है. पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने कंप्यूटर से सम्बंधित कोर्स भी किया और बाद में उन्होंने आर्ट्स में मास्टर्स की डिग्री भी हासिल की है. शहनाज़ ने एकाउंटिंग से सम्बंधित टैली जैसे सॉफ्टवेयर सीखें हैं, और निरंतर कुछ न कुछ सीखती और समझती रहती हैं. कंप्यूटर प्रशिक्षण का फायदा उन्हें आज प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन के साथ हो रहा है जहाँ वो बतौर टीम लीडर ई साक्षरता फैलाने कार्य कर रहीं हैं.

प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन से जुड़ने से पूर्व वो एक ट्रेवल कंपनी में भी कार्य कर चुकी है जहाँ के अनुभव के बारे में वो बताती हैं कि “वहां के लोग बहुत ही अलग थे, वहां मुझे यह बात महसूस होती थी की लड़कियां अगर घर से बाहर निकलती है तो उन्हें एक निम्न दृष्टी से ही देखा जाता है. मेरा मानना है कि जो लोग आपको सम्मान नहीं दे सकतें उन लोगों को सम्मान देने की कोई जरुरत नहीं है. यही वजेह से मैंने अपने आत्मविश्वास और निष्ठा को बरक़रार रखना ठीक समझा, उनका साथ छोड़ आगे बढ़ना ज्यादा अच्छा था.” जॉब छोड़ने के कुछ दिनों बाद ही उन्हें प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन के साथ कार्य की शुरुआत की. डर था की कहीं वैसा ही अनुभव यहाँ न मिलें लेकिन वो बताती हैं “आज करीब 6 साल हो गए, लेकिन जो अनुभव मेरा वहां था उसके बिलकुल विपरीत यहाँ है. यहाँ हमें किसी भी तरह की कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा है. कभी किसी ने न तो कभी ताने कसे और न ही कभी ऐसा जताने की कोशिश की कि हमारी जगह घर में है. मुझे लगता है कि प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन से ज्यादा अच्छी कार्य संस्कृति (वर्क कल्चर) हमें कहीं नहीं मिल सकती.”

टीम लीडर की भूमिका से पूर्व शहनाज़ ने बतौर संचारक (टीचर) कार्य की शुरुआत की थी जहाँ उन्हें एक स्कूल में करीब 800 बच्चों के बीच कार्य करने की जिम्मेदारी डी गई थी. फिलहाल बतौर टीम लीडर आज शहनाज़ की जवाबदारियाँ इलाकों का सर्वेक्षण करने, संचारकों की जरूरतों पर ध्यान देने, उन्हें प्रशिक्षित करने, प्रबंधन की जरूरतों पर ध्यान देने और समय-समय पर संदेश वाहक बनने, बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान देने, उनकी उपस्थिति पर नज़र रखने, बच्चों को पढ़ाने, परीक्षा लेने, रिजल्ट बनाने, रिपोर्ट्स बनाने और संचारकों के साथ साप्ताहिक मुलाकात कर हर मुमकिन चीजों पर विचार करने की है. आज शहनाज़ 12  शालाओं में, 13 संचारकों के साथ करीब 6,000 बच्चों के बीच में कर कर रहीं हैं.

आनेवाले समय में शहनाज़ पी.एच.डी के लिए तैयारी कर रही है, टीचिंग के क्षेत्र में उनकी रुचि के चलते अब वो व्याख्याता (लेक्चरर) के रूप में खुद को देखना चाहती हैं. अभी के कार्य के बारे में वो बताती है कि “कंप्यूटर आनेवाले कल की जरुरत है और बच्चों को अच्छा ज्ञान देना हमारी जिम्मेदारी है. ऐसे में टीचर्स की भूमिका काफी मुख्य है, ख़ास तौर पर ऐसे बच्चे जो कंप्यूटर तक नहीं पहुँच सकते उन तक कंप्यूटर ज्ञान पहुँचाना सराहनीय है.”


वैसे दिनोंदिन होने वाली बातें और आसपास घट रही घटनाओं पर शहनाज़ को छोटी-छोटी कवितायें और विचार लिखने का बहुत शौक़ है. इन दिनों वो युवाओं पर आधारित विषयों पर लिख रहीं हैं.

Friday, 18 December 2015

“A dream doesn’t become reality through magic; it takes sweat, determination and hard work’ - Story of Komal Ranpise

With the number options that our generation has been offered in different sphere of our lives, it is but natural to not have a concrete plan for our life. However, this is not always a bad thing. Komal Ranpise’s testimony, a team leader at Pratham InfoTech Foundation(PIF), confirms this.

Komal Ranpise is a hard working woman who hails from a family of 4 sisters. Having been brought up as the second daughter in her house, Komal is familiar with responsibilities and duties. Ever since she was in school, Komal had an inkling towards the teaching profession. Therefore, in order to fulfil her want and love for teaching, Komal completed a Diploma in Education (D.Ed) course before beginning to teach at an institution near her home.

In 2009, Komal also completed a course in MScIT. Having done this, she knew her way with computers. She admits that she never really imagined herself teaching students how to make use of computers. She was, however, certain that she wanted teaching to be what she did for the rest of her life. That’s why, she took up a teaching position at PIF when a vacancy arose and worked as a sancharak (computer instructor) under the Computer Aided Learnig Program.

In the beginning, Komal enjoyed herself working as a Sancharak. This is because, after many years of hard work and patience, her dream of being a teacher finally came true. However the teaching experience became difficult as she realized that the work expected of her was taxing on her resources.

Soon, she was informed about the post of a Team Leader. She applied for this position and was selected for the post of Team Leader from amongst numerous others. She chose to opt for this instead of continuing as a sancharak because the work of a Team Leader is more structured and was more appealing to Komal.

Now, Komal works as a Team Leader and she is very happy with where she is in life. If you’d meet her, you’d know that she is a very outgoing person. She admits that she enjoys the work of a Team Leader because not only does she have to overlook the working of numerous Sancharaks who are her responsibility but she also gets a chance to go teach at the different centres that she is in charge of. Alongside this, she also has the opportunity to meet new people and interact with them such as the students at these centres and the principles of these centres. This gives her a chance to keep expanding her horizons which she believes is very important for the development of her personality.

When asked whether there is anything that she has learnt while working at PIF and that has helped her grow as an individual, she says, “Working here has made me become more confident about myself and the skills that I posses”. She further explains that she was afraid to talk to people earlier. However, after becoming a Team Leader, she was forced out of her comfort zone which has shaped the person she has become today. She truly enjoys her job as not only is she fulfilling her dream of being a teacher but this job has given much more than she ever expected for which she is ever grateful.
Komal is a living example of how, if we work hard enough, all the right opportunities will come our way and life will sort itself for those who are willing to put in that extra effort and go that extra mile.


Thursday, 17 December 2015

अनुभवाचे ज्ञान घेऊन प्रगती करायला आवडेल ! - दिलीप सिंग

Dilip Singh

 कौटुंबिक परिस्थिती चांगली असून शैक्षणिक आलेख उंचावणारे तरुण सभोवताली असतात. नोकरी करण्याची आवश्यकता नसतानाही काही जण काम करतात. कारण त्यांना स्वत:ला काही तरी वेगळे करणे महत्वाचे वाटते. नोकरी करुन त्यासोबतच उच्च शिक्षण घेणारे तरुण आपल्याला पहायला मिळतात. त्यांच्यातलाच एक आहे दिलीप... 

वडील उत्तराखंडमधील असून दिलीपचा जन्म लखनऊमध्ये झाला. त्याचे वडिल शुगर कॉर्पोरेशन लिमिटेडमध्ये सरकारी सेवेत होते. आईकडे घराची जबाबदारी होती. कुटुंबात आई-वडील, दोन बहिणी, एक भाऊ आणि दिलीप असे सहा सदस्य. दिलीपचे शाळा आणि महाविद्यालयाचे शिक्षण व्यवस्थित झाले. त्याने वाणिज्य शाखेतून पदवी संपादन केली  असून मास्टर्स इन बिझनेस अॅडमिनीट्रेशन इन मार्केटिंगमध्ये (एम.बी.ए.)उच्च शिक्षण सुरु आहे. 

दिलीपचा मित्र भारतीय जीवन विमा निगममध्ये कामाला होता. त्याने दिलीपला काम करण्यासंबंधी विचारले. तेव्हा त्याने सकारात्मकता दर्शवली. दिलीपला पहिली नोकरी भारतीय जीवन विमा निगममध्ये (एल.आय.सी.) लागली. त्यामध्ये लोकांना एल.आय.सी. पॉलिसीची माहिती सांगणे, विमा समजावणे, इ. काम होते. काही वेळा कामानिमित्त  फिल्डवरही दिलीपला जावे लागत  होते. पदवीच्या शेवटच्या वर्षाला असताना अभ्यासासाठी वेळ मिळावा, म्हणून त्याने नोकरी सोडली.

पदवीचे शिक्षण झाल्यानंतर दिलीपकडे वेळ होता. त्याच दरम्यान त्याच्या मैत्रीणीने सांगितले की, ‘प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनमध्ये काम आहे. तु करशील का ?’ तेव्हा दिलीपकडेही कोणते विशेष काम नव्हते. त्याने तिला होकर दिला. तेव्हा तीन दिवस संचारकांच्या प्रशिक्षणाला दिलीप उपस्थित होता. त्यानंतर त्याला विचारण्यात आले कि, ‘तुला विद्यार्थ्यांना शिकवण्यास आवडेल का ?’ क्षणाचाही विलंब न करता दिलीपने  ‘होकार’ दिला. 

संचारक पदापासून दिलीपच्या कामाची सुरुवात  प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनमध्ये झाली. विद्यार्थ्यांना  शिक्षण देण्याचे काम आपल्याकडून होते, याचा त्याला आनंद आहे. दिलीपसोबत  काम करणारे  सहकारीही त्याला मदत करतात. एखादी समस्या काम करताना उद्धभवली, तर वरिष्ठ योग्य मार्गदर्शनासह उपाय देतात. दिलीपकडून काम करताना चुका झाल्या, परंतू त्याच्यावर न रागावता त्याला त्या समजावून सांगण्यात आल्या. ही गोष्ट दिलीपला भावते.  दिलीपला कम्प्युटरचे ज्ञान होते. विद्यार्थ्यांना शिकवण्याची आणि हाताळण्याची पद्धत त्यला प्रशिक्षणातून मिळाली.  

दिलीप संचारक असताना विद्यार्थ्यांना शिकवायचा. त्यानंतर दीड वर्षात त्याला टीम लिडर पदावर बढती देण्यात आली. दिलीप टीम लिडर झाल्यावर त्याच्याकडे संचारकांना प्रशिक्षण देण्याचे दायित्व आले. संचारक पदाचा अनुभव असल्यामुळे  संचारकांना त्याला योग्य मार्गदर्शन देता आले. संचारक नवीन असल्यास त्याला शिकवण्याची पद्धत, विद्यार्थ्यांना समजून घेण्याची वृत्ती, त्यांच्याशी संवाद करण्याचे कौशल्य, इ. बाबी त्याला सांगता आल्या. तसेच मुख्याध्यापकांशी विद्यार्थ्यांच्या प्रगतीचा आढावा घेणे, संचारकांना येणाऱ्या समस्या सोडवणे, दैनंदिन कामावर लक्ष ठेऊन ते करणे, कामाचा अहवाल वरिष्ठांना देणे, इ. जबाबदाऱ्या दिलीपवर आहेत.

संवादकौशल्य, लोकांना आकर्षित करण्याची वृत्ती, संगणकाचे ज्ञान, व्यवस्थापन गुण, सांघिक कार्यतत्परता, इ. गोष्टी दिलीपला शिकता आल्या.  कोणतेही काम करताना उत्तम कामगिरी करणार असल्याचे दिलीप सांगतो. विद्यार्थ्यांना त्यांच्या कलाने आणि आनंददायी वातावरणात शिकवून त्यांच्या विकासाकडे लक्ष देणे महत्वाचे आहे, असे दिलीपला वाटते. भविष्यात त्याला एखादी चांगली संधी मिळाली, तर दिलीपकडून निश्चितच स्वीकारली जाईल.

प्रशिक्षणामध्ये मिळालेले  ज्ञान हे कायम स्मरणात राहते. ‘मला संस्थेमध्ये काम करुन जास्त शिकायला मिळेल. माझ्या ज्ञानामध्ये भर पडून त्याची लखाखी वाढेल. इथे टिकून चांगले काम केले, तर माझ्यामध्ये प्रगती होईल.’  असे दिलीप आवर्जून सांगतो.

           

Wednesday, 16 December 2015

स्वावलंबी बनना चाहतीं हूँ – रूही अंसारी

Roohi Ansari

बच्चों के मानसिक विकास में घर के वातावरण का बहुत बड़ा हाँथ होता हैं. अगर वक़्त रहते वातावरण को नहीं सुधार जाये तो कई बार बच्चे बहुत गलत राह ले लेतें हैं, लेकिन उनमे से कुछ बच्चे ऐसे भी होतें हैं जो उस मौहोल से निकलकर अच्छी राह ढूंढते दिखाई देतें हैं. ऐसी ही राह पर चलने को आमादा रूही अंसारी ने यूँ तो 10वीं तक ही पढ़ाई की हैं, लेकिन जीवन में वो स्वावलंबी बनना चाहतीं हैं. रूही के परिवार में नौं सदस्य हैं जिनमे माता-पिता, चाचा, दो भाई और चार बहनें है. पिता दस्तकारी (हैंडवर्क) का कार्य किया करते थे अब वो सेवानिवृत्त हैं. दोनों भाई कशीदाकारी (एम्ब्रोइडरी) का कार्य करतें हैं. आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया के चलते पढ़ाई से लेकर अन्य दूसरी बातों के लिए परिवार को काफी संघर्ष करना पड़ा हैं.

रूही का कहना हैं कि उनका काफी समय व्यर्थ हुआ है अब वो खुद के लिए कुछ करना चाहती हैं. वो बताती हैं कि “मैं अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूँ, जिसके लिए मुझे जो भी मेहनत करनी पड़ेगी वो करुँगी. मैं चाहती हूँ की अगर कोई विपरीत परिस्थिति आये तो मुझे किसी के सामने गिडगिडाना न पड़े.” फिलहाल रूही ज्वेलरी मेकिंग का कार्य कर रहीं हैं, इसमें आभूषणों की बनावट, उनमे पत्थर लगाना, अंतिम रूप देना आदि कार्य होतें हैं. फिलहाल उन्हें जो भी पैसा मिलता है वो उसे अपनी शिक्षा के लिए बचा रहीं है. वो ज्वेलरी डिजाइनिंग में आगे कुछ अच्छा कोर्स करना चाहतीं हैं, ताकि अपनी कला को वो सही अंजाम तक पहुंचा सकें.


इसके अलावा रूही प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन द्वारा चलाये जा रहे कंप्यूटर कोर्स का हिस्सा रहीं हैं इस कोर्स में उन्होंने काफी कुछ सीखा है, उनका मानना हैं कि “कंप्यूटर इनदिनों हर क्षेत्र में इस्तेमाल होता है अगर आनेवाले समय में मैं ज्वेलरी मेकिंग कंप्यूटर से करने लगी तो समय और लागत दोनों को बचाया जा सकता हैं और कम समय में ज्यादा से ज्यादा उत्पादन भी हो सकता है. ज्वेलरी मेकिंग के लिए अगर कोई कंप्यूटर तकनीक हो तो मैं उसे भी सीखना चाहती हूँ.”

Tuesday, 15 December 2015

True love for teaching is what helped her stand again- Story of Vaishali Khandale

Vaishali Khandale

While she nurtured the desire to teach children, for years, Vaishali Khandale never got to do what she wanted as she feared that it would upset her husband. He was of the belief that women should not work. However after many years of waiting, Vaishali could take it no more and took up a job as a preschool teacher. She had to go through a lot of conflict as a result of this. But she went on. She loved her job, no doubt, but each day was getting more and more difficult as there was no peace between the couple. And so one day she quit. Things got better at home and her children began to grow in a happy environment. She was happy but yet had an empty space.

Years went by and on one dark day she lost her husband in an accident. Vaishali was heart broken and was left with hardly anything to go on. She struggled for a few days until an angel in disguise came to her rescue. Vaishali  was blessed with a kind hearted sister in law who readily took up the responsibility to look after Vaishali and her  two children. She gave them shelter in her home and also paid for the children’s education. Time passed by and Vaishali felt the need to do something. Something new and something interesting and so, she joined a computer course.

Soon she heard about Pratham InfoTech Foundation (PIF) and its work. She enquired and was lucky to be immediately selected as a Community Connector at PIF’s Community Training and Information Center in Panchasheel Nagar, Pune. “I am glad I got this job at the time that I needed it the most. I love learning and teaching has been my passion since years”, says Vaishali.

Her main role as a community connector being in charge of the center and mobilization of students. She also conducts soft skill workshops in the community. “I find it very challenging to convince students. And simply love it when I am able to get them here and when they learn something and benefit from it”, shares Vaishali.

Vaishali at the center



Her fear is decreasing each day. She wants to be someone and earn a name for herself. “I want to make a difference in the lives of the women in my community through Information Technology. I love what I do and I love what the organization does”, says Vaishali with a sparkle in her eyes.

Monday, 14 December 2015

भविष्यातील ऑनलाईन कामांसाठी डिजिटल लिटरसी कोर्स फायदेशीर ! - निशा पाटील


Nisha Patil

“आम्ही अंगणवाडी सेविका | संगणक शाळेला जाणार  ||
आम्ही नाही, नाही म्हणणार |  संगणक शाळेला जाणार  ||”

हे सूर आणि शब्द रचना आहे निशा पाटील या अंगणवाडी सेविकेचे. ज्या ९ वी उत्तीर्ण असून १० वीची परीक्षा देण्याच्या प्रयत्नात आहेत. पनवेलमध्ये त्या राहत असून घरी सासू, पती, एक मुलगा आणि एक मुलगी अशी त्यांची कौटुंबिक पार्श्वभूमी.


सर्वांना डिजिटल लिटरसी कोर्सची माहिती एका बैठकीत कोर्स प्रमुखांनी सांगितली. अंगणवाडी सेविकांना भविष्यात ऑनलाईन माहिती भरावी लागणार असल्याचे वरिष्ठांनी सांगितल्यावर  निशा पाटील यांनी कम्प्युटर कोर्ससाठी प्रवेश घेतला. त्यांना वर्ड, पेंट,एक्सेल, पॉवर पॉईंट, इ-मेल, इंटरनेट, इ. कम्प्युटर संदर्भातील बाबी शिकता आल्या. ‘सुरुवातीला कम्प्युटर समोर बसायची भीती वाटायची, माउसही पकडता येत नव्हते. डिजिटल लिटरसी कोर्स झाल्यावर   कम्प्युटर समोरुन उठावेसेच वाटत नाही, कोर्सचे चार तास कधी संपायचे हेच कळत नव्हते.’  असा अनुभव निशा पाटील यांनी सांगितला. त्यांना इंटरनेटमध्ये जेवण बनवण्याच्या विविध पद्धती, साड्यांचे वेगवेगळे प्रकार, जगातील माहिती, ऐतिहासिक छायाचित्रे, आदीं पाहायला आवडून ते समजायला लागले.  एका जागेवर बसून जगात काय सुरु आहे. हे आपण कम्प्युटर आणि इंटरनेटच्या माध्यमातून पाहू शकतो, असे त्यांना वाटते.

अंगणवाडी सेविकेचे काम निशा पाटील करत असून बालकांची काळजी घेऊन त्यांच्या सुदृढतेकडे लक्ष देणे, मुलांचे संगोपन करणे, अनौपचारिक शिक्षण देणे, गरोदर मातांना सेवा पुरवणे, किशोरवयींना मार्गदर्शन करणे,  इत्यादी कामांची जबाबदारी त्यांच्यावर आहे. स्वत:च्या मुलाप्रमाणे अंगणवाडीतील मुलांची काळजी घेण्यात येत असल्याचे त्या सांगतात. गाणी, गोष्टी, मुळाक्षरे, बाराखडी, कविता, इ. अंगणवाडीत शिकवले जाते. निशा पाटील नातेवाईक आणि त्यांच्या मुलांना कम्प्युटर कोर्स शिकण्यासाठी मार्गदर्शनही करतात. घरात बसून राहण्यापेक्षा मुलांना शिकवण्यात आनंद वाटतो, अशा भावना त्यांनी व्यक्त केल्या. 


Friday, 11 December 2015

नामुमकिन कुछ भी नहीं- हिना शेख़

Heena Sheikh

हम सबके कोई न कोई ख्वाब ऐसे होते हैं जो सोचने पर मजबूर करतें हैं, की क्या अब उन ख्वाबों की ओर दोबारा नहीं बढ़ा जा सकता? ऐसा ही कुछ वाकया मुंबई में रहने वाली हिना शेख़ के साथ हुआ, घर में माता-पिता भाई और एक बहन के इस परिवार में पिता गाड़ी चालक हैं, भाई फर्नीचर बनाने का कार्य और बहन कॉल सेंटर में कार्य करती हैं. हिना की पारिवारिक दशा बुरी थी और इसी के चलते पढ़ाई से लेकर और दूसरी अन्य सुविधाओं तक इस परिवार को काफी परिश्रम करना पड़ा है.

हिना की इच्छा हमेशा से ही डॉक्टर बनने की थीं लेकिन परिस्थिति प्रतिकूल थी, जिसके चलते उन्हें आर्ट्स से अपनी पढ़ाई करनी पड़ी. लेकिन उनकी चिकित्सकीय क्षेत्र में जाने की इच्छा व्यर्थ नहीं हुई, वो बतातीं हैं कि “पैसों के चलते डॉक्टर बनने की इच्छा मेरी पूरी नहीं हो सकी. लेकिन हमारे फैमिली डॉक्टर की मदद से मैंने नर्सिंग का क्रेश कोर्स किया. कोर्स में मैंने डॉक्टरों की मदद करना, मरीजों को दवाई देना, रिपोर्ट्स बनाना और अन्य नर्सिंग से जुड़े गुण सीखे. आज मैं कांदिवली के ऑस्कर हॉस्पिटल में नर्स हूँ.”


यह एक संयोग हैं की कोई बुनियादी ज्ञान न होने के बावजूद वो आज नर्सिंग का कोर्स कर चिकित्सकीय क्षेत्र से जुड़ चुकीं हैं. हिना चाहतीं हैं कि आनेवाले समय में वो बी.एस.सी/ एम.एस.सी नर्सिंग करें. उन्हें लोगों की मदद करना, उनका इलाज करना अच्छा लगता है और वो इसी को अपना करियर बनाना चाहतीं हैं.

Thursday, 10 December 2015

“I have a great team and interesting work to do” - Rasika Khopade

“I was a housewife without any ambition, but my husband always encouraged me to go ahead”, says Rasika. Marriage brings along a whole new set of responsibilities and Rasika was drowned in her day to day chores, forgetting that she too had dreams. Thanks to her supportive husband, Rasika found what she loved and got herself busy with it—Teaching!

Rasika’s husband was the principal of a school around the area she lived. The school had a computer center run by a trust. “I would always see students going for computer classes and I too wanted to join and so one day I did. I completed my MSCIT course there and was appointed as a computer teacher there itself”, shares Rasika.

After a couple of months of working there Rasika heard of Pratham InfoTech Foundation’s DigiTech centers and also about a vacancy there.

She was immediately selected and began work as a sancharak (computer instructor). She loved her new job which she says was very convenient in terms of timings and she also learnt a lot. She was able to pay attention to her family and two small kids along with fulfilling all her duties at the center.
Having worked as a sancharak for a year at Swami Vivekanand high School, Vitawa, Rasika Khopade was soon made Team Leader of 10 schools with a team of 15 sancharaks.

It was a new role with a lot of work. Rasika learnt to travel as it was a part and parcel of her new role. She began learning more about herself and discovered that she could do much more than she ever imagined. “There is nothing difficult about my role now. I have a great team and interesting work to do”, says Rasika.

“The course work and the teaching methodology at PIF is very different from other computer institutes around. Also the kind of people working here and the level at which we bond is amazing. It is more of team work, sharing and learning each day. I have grown a lot. Both in confidence and strength”, shares a happy Rasika.

Just when things were beginning to look good, a tragic day struck Rasika’s life. She lost her husband and was left alone to look after herself and her two toddlers. She began living with her mother in Naigaon. The schools I work with are very far from Naigaon and I have to travel twice as much. I am drained of all energy by the end of the day but it is all worth it. I have to, and want to give my children all that they had when their father was around. Life is tough now but I take each day as it comes”, shares a teary Rasika.


Rasika had always dreamt of starting a computer institute for small children where they begin to get the sense of the field of Information Technology at an early age. She is a bit shaken now but still holds on to her dream and hopes that some day she will find the strength and the finance to work on it. As of now her prime goal is to be there for her children. She says that working at PIF gives her a different sense of comfort and belonging and that keeps her going.

Wednesday, 9 December 2015

नोकरीतील बदल आयुष्याचे रंग उलगडत गेला. - मुकेश थरुका

Mukesh Tharuka

राजस्थानातील अजमेरमधील नंदवाडा गावात राहणारा मुकेश थरुका. वडिल पोलिस सेवेत असून कौटुंबिक स्थिती सर्वसाधारण. आई-वडिल, दोन भाऊ, दोन विवाहित बहिणी आणि मुकेश असा परिवार. मुकेशचे शालेय आणि महाविद्यालयीन शिक्षण व्यवस्थित झाले.    
मुकेशचे वडील १९९९ ला निवृत्त झाल्यानंतर आर्थिक प्रश्न हळू-हळू उभे राहू लागले. मुकेशचे २००१ ला बारावीचे शिक्षण झाले. त्यानंतर त्याचे लग्नही झाले. मुकेशचा बालविवाह वयाच्या ६ व्या वर्षीच झाला होता. पत्नीची दहावी आणि मुकेशचे बारावीपर्यंत शिक्षण  झाल्यानंतर दोघे एकत्र रहायला लागले. बारावीनंतर मुकेश नोकरी शोधण्यासाठी प्रयत्न करु लागला. त्याला योग्य मार्गदर्शन मिळाले नाही. पुढे काय करायचे हेच त्याला कळत नव्हते.

मुकेशची पत्नी सासरी आल्यानंतर त्याच्या नोकरीचा ‘श्री गणेशा’ झाला. गावामध्ये एका खाजगी शाळेत पहिली ते पाचवीच्या विद्यार्थ्यांना शिकवण्याचे काम मुकेशला मिळाले.  त्याने दोन वर्षे महिना २५०/- रुपये  मानधनावर नोकरी केली. त्याचा घर खर्चालाही हातभार लागायचा. परंतू कमी मानधन,आर्थिक चणचण आणि कौटुंबिक समस्या इ. कारणांमुळे मुकेशने शाळेची नोकरी सोडली.  

सिमेंटच्या कारखान्यात मुकेश नोकरीला लागला. ते काम अत्यंत कष्टप्रद असून त्याला जखमाही झाल्या. दोन ते तीन महिने काम करुन त्याने ती नोकरीही सोडली. वृत्तपत्रामध्ये सिक्युरिटी गार्डची जाहिरात वाचून ते काम केले. परंतू रात्रीचे जागरण आणि तब्येत बिघडल्यामुळे सहा ते सात दिवसात त्याने नोकरी सोडली. कधी फर्निचरच्या कारखान्यातील कामाची संधी हुकली, तर कधी  मित्राने दिलेल्या कामात आवड निर्माण झाली नाही. कुठे महिनाभर काम, तर कधी सात दिवस काम ...दोन दिवस काम....कामाची धरसोड वृत्ती आणि निराशा यामुळे घरातील नातेवाईक मुकेशला घालून-पाडून बोलायचे. त्याची गावातही ‘बिनकामाचा’ माणूस अशी हेटाळणी झाली.  

गावात राहणारे आणि पोलिस सेवेत कार्यरत असणाऱ्या एका व्यक्तीने मुकेशला साथ दिली. त्याच्या कठीण परीस्थितीत योग्य मार्गदर्शन केले. ‘जिथे मी मुलाखतीला जातो, तिथे कम्प्युटरचे शिक्षण विचारले जाते. मला कॉम्प्युटर शिकणे आवश्यक आहे.’ असा विचार मुकेशने केला. कम्प्युटरचे भविष्यातील महत्व लक्षात घेता, त्याने कम्प्युटर कोर्स केला.

अजमेरमध्ये वीज वितरण विभागात मुकेश रात्र पाळीत नोकरीला लागला. दिवसा कम्प्युटर कोर्स व अभ्यास आणि रात्री नोकरी. अजमेरला भाड्याने खोली घेऊन मुकेशने पत्नीलाही तिथे आणले. तीन-चार महिने व्यवस्थित  काम सुरु असतानाच अचानक वडिल आजारी पडल्याचे त्याला कळाले. गावात-शहरात तपासणी केल्यानंतर त्यांना कर्करोग असल्याचे निदान झाले. अजमेरच्या डॉक्टरांनी वडिलांना जयपूरच्या रुग्णालयात नेण्यास सांगितले. त्यानंतर त्यांना पुन्हा उपचारासाठी अजमेरला आणले. अशातच मुकेशच्या वडिलांचा आजार बळावला आणि त्यांची प्राणज्योत मावळली.

मुकेशच्या मित्राला कॉम्प्युटर जाणकार व्यक्ती नोकरीसाठी हवी होती. त्यासाठी मुकेश स्वत: तयार झाला आणि त्या क्षणापासून मुकेशच्या आयुष्याला कलाटणी मिळाली. जयपूरला मित्राच्या कंपनीत जे काम दैनंदिनीत (डायरी) लेखी स्वरुपात व्हायचे, त्याला मुकेशने कम्प्युटर आणि इंटरनेटची जोड दिली. त्यामुळे कामांना वेग आला आणि नवीन कामे मिळू लागली.

अशातच जून २०१० ला जयपूरमध्ये ‘प्रथम’ स्वयंसेवी संस्थेला ‘एज्युकेशन फॉर एज्युकेशन’ प्रकल्पासाठी समन्वय (को-ऑर्डीनेटर) पदासाठी प्रतिनिधी हवे होते आणि मानधनही व्यवस्थित होते. याची माहिती मुकेशच्या वर्गमित्राने त्याला दिली. मित्राने एक अर्ज मुकेशला तातडीने दिला. मुलाखत आणि लेखी चाचणीच्या आधारावर मुकेशची समन्वय (को-ऑर्डीनेटर) पदासाठी निवड झाली आणि त्याला औरंगाबादला प्रशिक्षणासाठी जावे लागले.  मुकेशने ग्रामीण भागातील विद्यार्थ्यांच्या शिक्षणासाठी दोन वर्षे काम केले.  त्यानंतर मुकेशला मास्टर ट्रेनर म्हणून जबाबदारी देण्यात आली. फाउंडेशन कोर्स फॉर एम्प्लॉयब्लिटीचे ट्रेनिंग मुकेश देतो. त्याची कामगिरी पाहून त्याला  राजस्थान आणि गुजरातची जबाबदारी देण्यात आली. कालांतराने ‘लर्न आऊट ऑफ बॉक्स’ प्रकल्पाचे राजस्थानमधील दायित्व मुकेशला मिळाले. त्यामध्ये शाळेची निवड, प्रशिक्षण, आदी व्यवस्थापकीय काम मुकेशकडे होते.    

Mukesh training his team in PIF


त्याच दरम्यान १ मार्च २०१४ ला प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनमध्ये मुकेश रुजू झाला. मुकेश कोटा आणि पिलानी शहराचा टीम लिडर म्हणून दायित्व देण्यात आले. तसेच जयपूरमधील ट्रेनिंगची जबादारीही त्याच्यावर आहे. एखाद्याला समजावून सांगण्याचे संवाद कौशल्य, कम्प्युटरची तांत्रिक माहिती, सांघिक कामाची आवड, ट्रेनिंग देणे, आदी गोष्टी कामाच्या अनुभवावरुन मुकेशने शिकल्या. हार न मानता स्वत:ला सतत प्रेरणा देणे मुकेशच्या स्वभावातच होते. आजुबाजूला काय सुरु आहे, कशाला मागणी आहे... भविष्यात कशाची आवश्यकता आहे, हे मुकेश सांगू शकतो.

गावी घरी गेल्यावर लोक इतरांना सांगतात, ‘संघर्ष करुन परिश्रमाने मुकेशसारखे बना.’ मुकेशच्या खडतर प्रवासात त्याच्या पत्नीने साथ दिली. त्याला दोन मुले आहेत. मागे वळून पाहताना दु:खातून सुखाच्या वास्तव अनुभूतीचा प्रत्यय मुकेशला येतो.             

Mukesh with his family