Saturday, 30 January 2016

कार्य में संतुष्टि होनी जरुरी – रेखा मोहित

Rekha Mohit

“आग में तपकर सोना तैयार होता है” ठीक इसी तरह मुंबई में रहने वाली रेखा मोहित भी, जीवन की आपाधापी में तपकर तैयार हुई है. शादी से पूर्व परिवार में माता-पिता, भाई और उन्हें मिलकर तीन बहनें भी थीं. फिलहाल वो उनके पति और बेटे के साथ मुंबई में खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहीं हैं. रेखा का बचपना बहुत ही उतार चढाव से गुजरा है, पिता फिल्म इंडस्ट्री में मेकअप मैन थे, लेकिन जीवन में घटित एक घटना ने उनका मनोबल तोड़ दिया. सदमा ऐसा था की, वो फिर अपने कार्य पर ध्यान केन्द्रित न कर सकें. ऐसे में परिवार पर संकट के बदल देख माँ और रेखा की बहनों ने खूब परिश्रम कर के घर की जरूरतों को पूरा किया.

जहाँ एक ओर परिवार पर काले बादल मंडरा रहे थे वहीं दूसरी ओर पढ़ाई में होशियार रेखा जीवन में कुछ बनना चाहती थी. किसी तरह दसवीं तक का शिक्षण हासिल कर आगे की शिक्षा और दाखिले के लिए उन्होंने कार्य करने का फैसला लिया. माँ जूते बनाने की एक कंपनी में कार्य करती थीं, उसी कंपनी में छुट्टियों के दौरान रेखा ने भी स्टॉक मेंटेनेंस का कार्य संभालना शुरू कर दिया. जो कुछ मानधन उन्हें यहाँ से मिलता था वो उसे ग्यारहवीं और बारहवीं के दाखिले के लिए जोड़ा करती थी. जिसके बाद बिना रुके उन्होंने कार्य करते हुए मुंबई से रात में शिक्षण प्रदान करने वाले विश्वविद्यालय से बीकॉम की पदवी हासिल की.

रेखा अपने जीवन के बारे में बताती हैं कि “एक समय ऐसा था की कई बार घर में दो वक़्त की रोटी भी नहीं होती थी. हमने अलग- अलग तरह के कार्य जैसे किशमिश बनाने वाली कंपनी, कांच की कंपनी, गजरा बेचना, हार और मालाओं का व्यवसाय, कंडों (सूखे गोबर) का व्यवसाय आदि करके परिवार का पेट पालते थे. परिस्थिति ऐसी थी कि मुझे ग्रेजुएशन तक, लालटेन और रोड की लाइट में, देर रात तक पढ़ाई करनी पड़ती थी.” ऐसी ही अनेक बातें हैं, जिनके कारण रेखा जीवन में प्रबल बनी हैं, और उनकी यही प्रबलता आज उनके कार्य में भी दिखती है.

1996 में ग्रेजुएशन पूरा कर, उन्हें प्रथम संस्था के साथ कार्य करने का मौका मिला; जो उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. बचपन से अलग- अलग कार्यों को पूरी निष्ठा से करने वाली रेखा ने अपनी पूरी इमानदारी से संस्था के कई कार्यक्रमों की शुरुआत की और उन्हें सफल बनाया. वासंती वर्ग से शुरुआत करते हुए, बालवाड़ी के 250 वर्ग उन्होंने मुंबई में अनेक जगहों पर शुरू किये. जिसको देखते हुए संस्था ने उन्हें ट्रेनिंग एंड मोनिटर, ट्रेनिंग लीडर और फिर कुछ समय के बाद जोनल इंचार्ज जैसे पद पर नियुक्त किया. उनके उत्कृष्ट कार्य को देखते हुए उन्हें संस्था द्वारा शिल्पा पुरस्कार से नवाज़ा गया. राजस्थान के जयपुर में उन्होंने महज आठ माह में उनके साथियों के साथ मिल कर शालाओं से अतिरिक्त बच्चों के 250 से ज्यादा वर्गों की शुरुआत की. जिसमे उन बच्चों को शालाओं में दाखिला दिलवाकर कीर्तिमान हासिल किया.

करीब 10 सालों तक अलग- अलग जगहों और पदों पर कार्य करने के बाद वो विवाह के पारंपरिक बंधन से जुड़ गई. लेकिन हवा को मुट्ठी में बंद करना न मुमकिन है और उन्होंने ने 2006 में प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन के साथ कार्य का आगाज़ किया. महाराष्ट्र के उरण और पेण की शालाओं में उन्होंने बच्चों के लिए कंप्यूटर प्रशिक्षण की शुरुआत की. इसके साथ ही उन्होंने डेटा मटेरियल से सम्बंधित कार्य की भी जिम्मेदारी ली. लेकिन वक़्त और समाज की जरुरत को देखते हुए संस्था ने उन्हें संपूर्ण महाराष्ट्र की शालाओं में कंप्यूटर प्रशिक्षण कार्यक्रम की जिम्मेदारी सौंप दी.

आज वो प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन द्वारा कंप्यूटर एडेड लर्निंग प्रोग्राम का नेतृत्व करते हुए, महाराष्ट्र और गुजरात की प्रचालन प्रमुख (ओपरेशनल हेड) का पदभार संभल रहीं हैं. यहाँ 223 केन्द्रों से शुरुआत करने वाली रेखा, आज 40 टीम लीडरों और 434 काबिल कार्यकर्ताओं की फ़ौज के साथ 397 शालाओं करीब एक लाख बीस हज़ार से ज्यादा बच्चों के बीच में कार्य कर रहीं हैं. कार्य के बारे में वो बताती हैं कि “इतने सालों में मैंने केवल मन की संतुष्टि के लिए ही कार्य किया है. मुझे मेहनत करना और लोगों के साथ काम करना अच्छा लगता है.” आनेवाले समय को ध्यान रखते हुए वो बताती हैं अगर कल के लिए आप खुद को तैयार करना चाहतें हैं, तो आपको ख़ास तौर पर तकनिकी में श्रेष्ठ होना पड़ेगा.

उनके कार्य की बदौलत आज अनेक लोगों का जीवन बेहतर हुआ है. कंप्यूटर के प्रशक्षण और बालवाडी के द्वारा रेखा ने हजारों लोगों के जीवन में बदलाव लाया है. इसके साथ ही कार्यक्षेत्र में भी उनके साथी उनसे सीख लेकर जीवन में बदलाव ला रहें हैं और आगे बढ़ रहें हैं. लेकिन रेखा कार्यकर्ताओं के लिए और भी ज्यादा कार्य कौशल पर काम करना चाहती है, वो बताती हैं कि “प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन में मेरी शुरुआत से अभी तक जो मैंने योगदान दिया है मैं उससे संतुष्ट हूँ, और आनेवाले सालों में मैं पूरी लगन से कार्य करने के लिए तैयार हूँ.”


साथ ही यदि जीवन में कभी मौका मिला तो रेखा वृद्ध लोगों के साथ कार्य कर रही संस्था से जुड़ कर कार्य करना चाहतीं है.

Friday, 29 January 2016

Sometimes all you need is that one push - Story of Jyoti Kolhe

Jyoti Kolhe

Currently studying in standard 9 and part of the Student Enrichment Program (SEP), Jyoti says that she now feels more drawn to studies than before.

No matter how much she tried, she would never manage to follow what was taught in her school. And thus she was unable to learn and go ahead in her studies. Her mom is a home maker while her dad is a plumber. She has an elder brother who also studies in the same standard as he lost a year. “My brother is also part of the SEP and has benefitted a lot just like me. My math has improved so much ”, says Jyoti.

She finds her teacher very friendly and understanding which makes it easier for her to cope in class. Jyoti is fond of dancing and participate in various programs in her neighbourhood. She loves the fact that the class is also taken on picnics and educational trips.

A girl who once ran away from studies is now dreaming of becoming a doctor and says she knows how much she needs to work to reach her dream and is also ready to put in that much effort. “I will study hard and make it happen”, says she.


Thursday, 28 January 2016

बचत गटाच्या माध्यमातून कुटुंबाला आर्थिक स्थैर्य मिळाले. - जयश्री मोकल

Jayashree Mokal

 जयश्री मोकल या पनवेलच्या असून त्या सातवी उत्तीर्ण आहेत. पती बँकेत कामाला आहे. त्यांना  दोन मुली आणि एक मुलगा असून ते शिकत आहेत. त्यांची आर्थिक परिस्थिती नाजूक असून बचत गटाच्या माध्यमातून त्यांना आर्थिक स्थैर्य प्राप्त झाले.

बचत गटाच्या संपर्कातून जयश्री मोकल प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनच्या सानिध्यात आल्या. मसाल्याच्या प्रशिक्षणाच्या निमित्ताने प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनच्या सदस्यांशी ओळख झाली. त्यांना शिवणकाम, मसाले, केक आणि इस्टन पीठ यांचे प्रशिक्षण संस्थेतील प्रतिनिधींनी दिले.  जयश्री मोकल यांनी स्वत: प्रशिक्षण घेऊन त्या इतर बचत गटातील सदस्यांना प्रशिक्षण देतात.  त्यांनी १३ वर्गांना शिवण काम, केक  आणि इस्टन पीठाचे प्रशिक्षण दिले आहे. जयश्री मोकल ‘इंद्रायणी बचत गटा’च्या अध्यक्ष आहेत. 

जयश्री मोकल इस्टन पीठ आणि मसाले तयार करुन ते विक्रीसाठी उपलब्ध करतात. शहरी भागात वांद्रे,वाशी, अलिबाग, जयपूर अशा विविध ठिकाणी त्या स्टॉलच्या माध्यमातून विक्री करतात. ‘प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनमुळे आम्ही घराबाहेरचे जग पाहू शकलो. कुटुंबाला आर्थिक मदतही बचत गटाच्या माध्यमातून झाली.’ अशी भावना जयश्री मोकल यांनी व्यक्त केली.


संवाद कौशल्य, विविध क्षेत्रातील लोकांशी ओळख, व्यवहार कौशल्य, सामाजिक शिष्टाचार, इ. गुण काम करताना अवगत झाल्याचे जयश्री मोकल सांगतात. सर्व महिलांना एकत्र करुन रोजगाराभिमुख बनवण्याच्या दृष्टीने जयश्री मोकल यांचे प्रयत्न सुरु आहेत.        

Wednesday, 27 January 2016

कभी सोचा नहीं था – अपर्णा पवार

Aparna Pawar

भारत में ऐसे कई महकमे हैं जो युगों से अभी तक कंप्यूटर रहित कार्य करते आ रहें है, लेकिन वक़्त और जरुरत के आधीन इन महकमों को भी कंप्यूटरीकृत किया जा रहा है. ऐसे में बरसों से बिना कंप्यूटर के कार्य कर रहे हजारों आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए अब कंप्यूटर प्रशिक्षण लेना आवश्यक हो गया है. अब कार्यकर्ताओं को उनके कार्य का विवरण ऑनलाइन डेटाबेस बना कर देना होगा. पनवेल में रहने वाली अपर्णा पवार भी इन्ही में शामिल हैं, कहतें है कि एक उम्र के बाद कुछ नया सीखने में मुश्किलातों से दो चार होना पड़ता हैं, लेकिन कंप्यूटर प्रशिक्षण के लिए यह कार्यकर्ता लालायित नज़र आ रहें हैं.

आंगनबाड़ी में अपर्णा का कार्य गर्भ के दौरान से जन्म तक माँ और बच्चों के विकास पर नज़र रखने का है. जन्म से पहले और जन्म के बाद माँ और बच्चे की देखरेख, प्रसव से जुडी बातें की जानकारी, खानपान, व्यायाम, और समय- समय पर दी जाने वाली चिकित्सकीय खुराक, यही नहीं पैदाइश के बाद छः माह तक दैनिक चिकित्सकीय खुराक, स्तनपान, टिका, वजन और उनके पोषणाहार के अलावा बच्चों को सिखाने का कार्य भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को करना पड़ता है. ऐसे में संपूर्ण बातों का डेटाबेस बना कर ऑनलाइन उपलब्ध करवाना, इन कार्यकर्ताओं की मुख्य भूमिका बन गई है.


कंप्यूटर साक्षरता की ओर कदम बढ़ा रहें इन कार्यकर्ताओं ने प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन द्वारा चलाये जा रहे डिजिटल लिट्रेसी कोर्स में कंप्यूटर से गुण सीखें हैं. इसमें माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस, इन्टरनेट जैसी कई एप्लीकेशन मौजूद हैं, अपर्णा बताती हैं कि “इस उम्र में मैंने कभी नहीं सोचा था की कंप्यूटर सीखना होगा, बच्चों को कंप्यूटर पर काम करते देख ऐसा लगता था कि काश हमें भी कंप्यूटर का ज्ञान होता, लेकिन अब हम भी कंप्यूटर चला सकतें हैं इस बात से मैं काफी उत्साहित हूँ.” अपर्णा की इच्छा है कि वो कंप्यूटर का एडवांस लेवल प्रशिक्षण लें ताकि न केवल दफ्तर में बल्कि घर में भी वो उसका इस्तेमाल कर सकें.

Tuesday, 26 January 2016

“I do not feel left out anymore” - Story of Pratham Gaikwad


Pratham Gaikwad

The Student Enrichment Program (SEP) works towards helping the slow learners and those who cannot afford extra coaching classes.

Pratham Gaikwad is one such student who claims to have benefitted a lot from the SEP. Currently in the 9th standard, Pratham says he found it very difficult to even sit in class as he just couldn’t follow what his teacher taught them. He felt left out and alone and wanted to change his state. But all the classes around were way too expensive. His father is a contract cleaner and earns Rs. 100/- a day while his mother is a domestic helper. He has 4 sisters who are married ad 1 who is a standard 10 drop out and currently at home. Pratham wanted to study. He wanted to do something in life and so was looking for help.

Just then a friend of his told him about the SEP that had begun in their village itself. Pratham thought this would help him and immediately got himself enrolled in it. He says that the program helped him a lot. His teacher worked hard with him as well as the other students in class. “Science was the most difficult subject for me. But my teacher teaches so well that I have begun loving the subject now. My Math has also improved”, shares Pratham when asked about his class.

Pratham
‘s school attendance has improved. His school authorities awarded him for his marked improvement and progress. He feels confident and wanted now. “My school teacher is happy that I always do my homework on time. Earlier I don’t remember doing it even once during the entire year”, says Pratham with a naughty giggle.

Pratham is also fond of music and dance. His cousin teaches him dance during free time. He also wants to do a DJ course and become a famous DJ someday. This he says will be his business on the side.

On a serious note, Pratham wants to be an engineer. We wish him good luck!


Monday, 25 January 2016

“स्वप्नातही वाटले नव्हते, कि या वयात कम्प्युटर शिकेन ! ” - लता पाटील

Lata Patil

 पनवेलच्या लता पाटील, वय ४७. कुटुंबात तीन मुले, दोन सुना आणि एक नात असून त्या नववी उत्तीर्ण आहेत.

‘पृथ्वी बचत गट’ स्थापनेपासून ते बँकेतून बचत गटाला कर्ज उपलब्ध करुन देण्यासाठी प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनचे सहकार्य लता पाटील यांना मिळाले. बचत गटासाठीच्या योजना  गावात बैठक घेऊन सांगितल्या जातात. मसाला बनवणे आणि शिवणकाम यांचे प्रशिक्षण लता पाटील यांनी घेतले. लता पाटील यांच्या बचत गटात १६ महिला सदस्य आहेत. त्याच्यासोबत मसाला बनवणे, लाडू तयार करणे, पापड बनवणे, इ. व्यवसाय बचत गटांतर्गत केले जातात. गावात हे खाद्यपदार्थ घरोघरी जाऊन विकले जातात. आसपासच्या गावातही माल विक्रीसाठी दिला जातो. बचत गटातील आदिवासी महिला ते काम योग्य पद्धतीने करतात आणि त्याचा फायदा त्यांना होत असल्याचे लता पाटील सांगतात. व्यवसायातून मिळालेले उत्पन्न सदस्यांना समप्रमाणात दिले जाते.     

शहरी भागांमध्ये बचत गटातून तयार केलेल्या खाद्यपदार्थांचे स्टॉल प्रदर्शनात आणि विविध कार्यक्रमात असतात. त्याचा फायदा बचत गटाला होतो. लता पाटील यांच्या बचत गटाला दोन वर्षे झाली असून त्यांच्या अनुभवाचा उपयोग गावातील इतरही बचत गटांना होत आहे. ग्राहकांकडून उत्पादनांना मागणी असून आम्ही ऑर्डरही स्वीकारतो, असे लता पाटील यांनी सांगितले.

‘लग्नानंतर मी घरीच असायचे. प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन आणि बचत गटाच्या माध्यमातून मी शिवणकाम शिकले आणि मसाले बनवण्याचे प्रशिक्षण घेतले. विविध कार्यक्रम, प्रदर्शने अशा वेगवेगळ्या ठिकाणी जाऊन नवीन व्यक्तींशी संपर्क मला वाढवता आला. आता मी कम्प्युटरचा डिजिटल लिटरसी कोर्स शिकत आहे. स्वप्नातही वाटले नव्हते कि, या वयात कम्प्युटर शिकेन.’ असे मत लता पाटील यांनी व्यक्त केले. कामाच्या माध्यमातून लता पाटील यांच्यामध्ये आत्मविश्वास आला असून त्यांचा जनसंपर्क वाढला आहे.  

Friday, 22 January 2016

लेखाधिकारी बनने की इच्छा है – ज्योति सोनकर

Jyoti Sonkar

मुंबई की ज्योति सोनकर फिलहाल हाउसिंग डेवलपमेंट फाइनेंस कारपोरेशन (एच. डी. एफ. सी) के क्रेडिट कार्ड विभाग में टेलीकॉलर का कार्य कर रहीं हैं. यह एक योजनाबद्ध कार्य हैं जिसमें हर माह उनको निर्धारित योजना के तहत ग्राहक बनाने होतें हैं. कई बार कॉल के दौरान कई ऐसी अनचाही गतिविधियाँ हो जाती हैं जो टेलीकॉलर को काफी परेशान करती हैं. इसी के चलते ज्योति क्रेडिट कार्ड विभाग से निकल कर बैंकिंग में अपना करियर बनाना चाहतीं हैं.

ज्योति ने प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन द्वारा चलाये जा रहे कंप्यूटर कोर्स को पूरा किया हैं, जिसके के तुरंत बाद उन्हें एच. डी. एफ. सी में कार्य का मौका मिला है. ज्योति ने वाणिज्य से स्नातक किया है, वो आगे पढ़ना चाहतीं है लेकिन पारिवारिक समस्याओं के चलते वो आगे की पढ़ाई नहीं कर पा रहीं हैं. वो बताती हैं कि “मुझे सरकारी लेकाधिकारी (सीए, CA) बनने की बहुत इच्छा थी लेकिन फिलहाल यह बात असंभव नजर आ रहीं है. अगर मौका मिला तो मैं जरुर अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहतीं हूँ.”

ज्योति के घर में माता- पिता, तीन भाई, भाभी और भांजा भी है. तीनों भाई जूतों की बिक्री का कार्य करतें हैं. बातों ही बातों में उन्होंने बताया कि उन्हें कानून में भी काफी दिलचस्पी है जब कभी वो किसी को कानून तोड़ते देखती हैं तो उन्हें कुछ न कर पाने का मलाल रहता है. वो खुद कानून की मर्यादा में रहना और अपना कार्य करना पसंद करतीं हैं.

Thursday, 21 January 2016

When teaching is your passion, your students will follow – Story of Ravindra Takavne

Hailing from a family whose main occupation is farming, Ravindra felt that he did not fit in. His father looked after his family as well as his relatives too. Days were getting tougher and Ravindra wanted to ease his father’s burden.  And so he chose to do something different and moved to Pune.

He always wanted to study higher and loved the teaching profession. He did his Bachelors in Education and simultaneously his MSCIT course. He then began working for a software company where in he had to market the software created and sell it to students and schools as well as install it for them. He also did his MSCIT course. He gained some knowledge and experience of the field of IT while working there.

He later went on to complete his Masters in Economics. During his second year he worked at various places in order to collect money to pay for his increasing academic hunger. He would go to college and later do shift jobs at a spice pounding factory. He was a supervisor there. He then joined a government firm that dealt with documentation. But Ravindra was not satisfied. He was earning the money he needed but his love for teaching was lost somewhere. He wanted to get back to it even if it would mean less money or no money at all.

And so Ravindra joined a school wherein he taught standard 7 to 10 students, subjects like economics and geography. He wasn’t paid anything but he was finally living his passion of teaching and educating. But sadly, this couldn’t go on for long. Ravindra had to find some way to live his interest as well as earn some money.

And as luck had it, an angel came along one day and told him about Pratham InfoTech Foundation (PIF) and the work they do. And yes, there was a vacancy too! Ravindra was selected as Digital Community Connector (DCC) at PIF’s Community Information and Training (CIT) centre in Hadapsar, Pune. He loved his job where he finally found a place where he could teach as well as earn a living. He was very enthusiastic and took up each task happily and completed it with determination. He managed to cover the entire area of Hadapsar and so was asked to shift his base so that the centre could cater to another community as well.

Ravindra continues to work as DCC now at Dhapodi CIT centre. “My job keeps me updated with the advances in the field of IT. "I teach students from various age groups and also learn from them each day. I like to bring creative changes in my class and work on it with all my heart", says Ravindra.
Ravindra believes that Information Technology is a fast growing field and everyone ought to be e-literate.

When asked about his experience at PIF, Ravindra shares, "When I joined I was very nervous and quite lost. But I was encouraged a lot and made to overcome my fears. Our Pune team is very united. That is our strength. I love best that I can sharpen my communication skills and build my network here. I always wanted to stay in the teaching field. I love working here”.


Ravindra says that in future he would love to continue teaching students, mainly women who are not allowed or are afraid of the field of Information Technology. Because if a women is e-educated she will e-educate her entire family!

Wednesday, 20 January 2016

ध्येयनिष्ठीत आणि अनुभवी कार्यशैलीने लोकांमध्ये ‘विश्वास’ निर्माण केला. - रेशमा जमादार

Reshma Jamadar

कर्नाटकच्या सीमारेषेवरील गुलबर्गा हे गाव. त्याच गावची रेशमा जमादार. लहानपणापासून खाऊन-पिऊन सुखी असणारे हे कुटुंब. रेशमाच्या वडीलांचे घरच्यांशी न पटल्याने त्यांनी कर्नाटक सोडले आणि ते थेट पुण्याला स्थायिक झाले. घरी आई-वडिल, तीन भाऊ आणि एक बहिण. रेशमा घरात सर्वात मोठी. वडिलांचे शिक्षण बारावी, तर आई अशिक्षित असूनही तिला शिक्षणाबद्दल ओढ.

सुरवातीला लहान-मोठे काम करुन रेशमाच्या वडिलांनी पिंपरी-चिंचवडला एक वर्कशॉप सुरु केले. रेशमा पाचवीत असताना घरची परिस्थिती व्यवस्थित होती. ती सहावीत गेली, तेव्हा  काही कारणाने पिंपरी-चिंचवडच्या एमआयडीसीतील कंपन्या बंद झाल्या. तीन वर्ष वडिलांचे वर्कशॉप बंद होते. कोणाच्याही हाताखाली काम न करण्याची मानसिकता वडिलांची होती. तेव्हा कुटुंबाला आर्थिक चणचण भासली.  तिचे शालेय शिक्षण व्यवस्थित झाले. रेशमा दहावीत असल्यापासून पहिली ते सातवीच्या विद्यार्थ्यांची शिकवणी घ्यायची. बारावीपर्यंत रेशमाने शिक्षण पूर्ण केले आणि त्यानंतर नोकरी शोधली.

रेशमाला स्क्रीन प्रिंटींगच्या कार्यालयात पहिली नोकरी लागली. व्हिजिटिंग कार्डची छपाई, लेटर हेड जुळवणे, नवीन ऑर्डर घेणे आणि त्यानुसार काम करुन देणे असे तिच्या कामाचे स्वरुप होते. नवीन लोकांसोबत भेट, आर्थिक ताळमेळ, व्यवसाय म्हणजे काय, . गोष्टी रेशमाला शिकता आल्या. कुठलेही काम मन लावून करणे.’ हा रेशमाचा स्वभाव. तिने दीड वर्षे स्क्रीन प्रिंटींगचे काम केले.

पुण्यात प्रथमचे २००२ ला बाह्य मुलांचे सर्वेक्षण सुरु होते. त्यासंदर्भातील माहिती रेशमाने घेतली. वस्त्यांचे सर्वेक्षण करुन २० मुलांना एकत्र करणे आणि शाळा बाह्य मुलांसाठी ब्रीज क्लास घेणे.’ अशा पद्धतीचे काम होते. वस्तीमधील २२ मुलांना सोबत घेऊन रेशमाने वर्ग सुरु केला. रेशमासह तिच्या सात मैत्रिणींनी ७ वर्ग सुरु केले. रेशमाचे दोन महिन्यांचे काम पाहून तिला पदोन्नतीसह टिम लिडर करण्यात आले. टीम लिडरचे काम करताना पहिल्यांदाच रेशमाने झोपडपट्ट्या पाहिल्या. वेगवेगळ्या ठिकाणी फिरताना रेशामामध्ये कामाची आवड निर्माण झाली. पुण्यात चार टीम लिडर असून त्यात रेशमा आघाडीवर होती. ती दिवसभर काम करुन रात्रीपर्यंत अहवाल (रिपोर्ट) तयार करत. त्याचे तिच्या आईला कौतुक वाटायचे. २००७ पर्यंत रेशमाने प्रथममध्ये काम केले.

रेशमाचे २००७ ला लग्न झाल्यावर ती पनवेलला आली. ७ जुलै २००७ ला प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनमध्ये रेशमाने कामाला सुरुवात केली. वस्त्यातील मुलांचे इंग्रजीचे विनामुल्य वर्ग घेण्याची जबाबदारी रेशमाकडे आली. शहर नवीन असल्यामुळे सुरुवातीला वस्त्यांना भेटी देणे आणि लोकांशी बोलणे या पद्धतीने रेशमाने काम सुरु केले. २० मुलांची १ बॅच अशा पद्धतीने तिने ११ वर्ग सुरु केले आणि त्याला वस्तीतून चांगला प्रतिसाद मिळाला. कम्प्युटर, ज्वेलरी मेकिंग, मेहंदी, ब्युटी पार्लर, शिवणकाम, उन्हाळी सुट्टीचे वर्ग अशा उपक्रमांनाही तिला उत्तम प्रतिसाद मिळाला. त्याच दरम्यान वस्तीपातळीवर बचत गट स्थापन करण्याची कल्पना पुढे आली आणि त्याचे काम रेशमाने सुरु केले.

बचत गटाचे काम चांगले असल्यामुळे जिल्हा ग्रामीण विकास एजन्सीकडे (डिस्ट्रीक्ट रुरल डेव्हलपमेंट एजन्सी) रेशमाने प्रस्ताव दिला. त्यानंतर पनेवल आणि उरणमध्ये दोन महिन्यात ५० बचत स्थापन करण्यात आले. २०१० पासून बचत गटांचे काम सुरु झाले. काही बचत गट एका बैठकीत तयार झाले, तर ज्या गावात कोणी ओळखतही नव्हते, अशा गावात नऊ वेळा गेल्यानंतर बचत गट स्थापन झाला.’ असा अनुभव रेशमाने सांगितला. दारिद्र्य रेषेखालील आदिवासी वाड्यांमधील बचत गटात रेशमा आणि तिच्या सहकाऱ्यांनी काम केले. आदिवासी पाड्यात काम करताना डोंगर चढून जाणे आणि नद्या ओलांडणे या अनुभवासह कधी भीती वाटली तर कधी काम करताना मजा आली. आदिवासी वाड्यांमधील घरे आणि रस्ते स्वच्छ असल्याचे रेशमा सांगते.’ काम करता-करता तिने मास्टर्स इन सोशल वर्कची पदवी संपादन केली.

Reshma at work

काम करताना कोणालाही नुकसान होता काम नये.’ हा हेतू रेशमाने ठेवला होता. विविध आढावा बैठकींमध्ये प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनच्या बचत गटांचे नाव सकारात्मकतेने चर्चिले जायचे. राष्ट्रीय कृषी आणि ग्रामीण विकास बँकेने (नाबार्ड) बचत गट सुरु करण्यासाठी प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनला विचारणा केली. नाबार्डला प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनने पहिल्यांदा प्रस्ताव दिला आणि तो मंजूर झाला. २०० बचत गट तयार करण्यासाठीची मान्यता पनवेल आणि उरण तालुक्यात संस्थेला मिळाली. आपण तयार केलेल्या २०० बचत गटांना कर्ज मिळाले आणि त्यांचे काम सुरळीत चालू आहे. पत्रावळी आणि द्रोण बनवणे, कॅटिंग चालवणे, टेलरिंग आणि मसाले बनवण्याचे प्रशिक्षण, . बचत गटांतर्गत व्यवसाय आणि प्रशिक्षण होते. ज्या महिलांना घराबाहेर पडता येत नाही, अशांना फॉल बिडिंग करणे, हुक लावणे, हात शिलाई करणे, भाकरी बनवणे, आदी कामे दिली जातात. प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशनचे उरण आणि पनवेलच्या ६२ गावांमध्ये २२८ बचत गट कार्यरत आहेत. त्यामध्ये नाबार्ड आणि दारिद्र्य रेषेखालील बचत गटांचा समावेश आहे. काही महिलांच्या आयुष्यात सकारात्मक बदल होऊन त्यांनी स्वत:सह कुटुंबेही सावरली आहेत.

आत्मविश्वास, संवाद कौशल्य, शुन्यातून निर्मिती करण्याचे धाडस, विना अनुभवी काम करण्याची लवचिकता आणि क्षमता, . गुण-कौशल्यांचा विकास कामातून झाल्याचे रेशमा सांगते.


रेशमाचा अनुभव दांडगा असून ती मोठ्या जबादारीची वाट पाहत आहे. रेशमा एकत्र कुटुंबात  राहत असून तिला दोन मुली आहेत. तिचे यजमान सामाजिक बांधिलकीचे असल्याचे ती सांगते. रेशमाला भविष्यात उद्योजिका व्हायचे आहे आणि ती झेप दीर्घ पल्ल्याची असेल, असे ती नमूद करते.

Tuesday, 19 January 2016

अगर कोर्स नहीं किया होता तो शायद जॉब न होती – रमेश बारला

Ramesh Barla

अधिकांश लोगों को हम अक्सर यह कहते सुनतें हैं कि कंप्यूटर का ज्ञान आज के युग के लिए बहुत जरुरी है. लेकिन इस बात का प्रमाण उस वक़्त देखने मिलता है जब किसी का जीवन वाकई में कंप्यूटर सीखने कि वजह से बदल गया हो. बात है मुंबई में रहने वाले रमेश बारला की, बी.कॉम से पढ़ाई के बाद उन्हें कई समय तक कार्य के लिए भटकना पड़ा है. शिक्षकों की सलाह के अनुसार उन्होंने प्रथम इन्फोटेक फाउंडेशन द्वरा चलाये जा रहे कंप्यूटर कोर्स में दाखिला लिया जहाँ उन्हें कंप्यूटर से जुडी बुनियादी बातें सीखने मिली.

जैसे ही उनका कोर्स ख़तम हुआ वैसे ही उन्हें प्रोसेसमाइंड नाम की एक कंपनी में कार्य करने का मौका मिला. यह कंपनी आई.सी.आई.सी.आई बैंक को डी-मैट ट्रेडिंग अकाउंट के लिए मदद करती है. यहाँ उनका काम कस्टमर बिलिंग को देखने का है और उसका डेटाबेस बनाने का हैं. वो बतातें हैं कि “अभी मेरा पूरा कार्य माइक्रोसॉफ्ट के एक्सेल सॉफ्टवेयर पर होता हैं, जिसमे हमें यह देखना होता है की किस कस्टमर के अकाउंट में कितना बैलेंस हैं, कितना पेमेंट करना या लेना है. अगर कोई अकाउंट बंद करने जा रहा है तो उस अकाउंट का सेटलमेंट आदि कार्य देखना होता हैं.” वो बतातें हैं कि “कंप्यूटर का ज्ञान जब तक मुझे नहीं था तब तक कहीं भी जॉब नहीं मिल रही थी, लेकिन अब मेरे पास एक अच्छी जॉब है.”


रमेश आनेवाले समय में एम्. कॉम करना चाहतें हैं. उन्हें शुरू से ही एकाउंट्स से सम्बंधित कार्यों में दिलचस्पी है, और इसी क्षेत्र में वो आगे बढ़ना चाहतें हैं. रमेश के घर में माता- पिता और एक भाई हैं, पिता मिस्त्री का कार्य करतें हैं.

Monday, 18 January 2016

Tough times don’t last…. Tough people do… -Story of Sarika Sasane

A year after completing her HSC, Sarika Sasane got married and was drowned in her newly earned responsibilities at home. Times were tough for Sarika. She and her husband found it difficult to make ends meet as he earned only Rs.4,000/- a month. They lived with their extended family but were not treated very well as they had got married against the wishes of the in laws.

Sarika had done a lot of courses earlier. IT and non IT. But found it very difficult to find a job. Somehow she managed to get a tele calling job but quit sooner than she thought because of unsuitable work timings. She was finding it very difficult to look after her 2 kids. Paying for their education and feeding them was getting close to impossible. She began washing utensils in different houses around to earn a little money. Her mother helped her with some money at times but she never told her husband about it as she did not want him to feel that he is not doing enough for the family.

Just when all hope was lost, Sarika’s friend told her of a vacancy at Pratham InfoTech Foundation’s Community Information and Training center, Pune. She immediately went over, enquired and was soon recruited as a Digital Community Connector. She loved her role and participated whole heartedly in the trainings given. “I had done the MSCIT course but did not get so much from there. Here I have learnt so much during the training and also during the course of my job”, says Sarika.

Sarika learns a lot as she works each day at the centre. She says her language has improved tremendously. She meets so many new people and learns how to deal with them. “I don’t find anything difficult in my job. I take up everything as a challenge and enjoy each task. Everything about my job helps me grow”, says Sarika.

When asked about what makes her happy, Sarika shares “There are all kinds of students that come to my center, from all age groups. House wives are great to work with. Sometimes I have to even hold their hand and help them with the mouse. It is exciting and rewarding for me to see how much I can do for them and how happy they are after achieving success. Teaching them and bringing a smile on their face, makes me happy”.

All that Sarika ever wanted was a job through which she could support her family. Now she wishes to get a better home for them. She, her husband and 2 kids sleep in the kitchen where there is hardly any space. She wishes to move out and give her children a better life. The neighborhood too is full of trouble. There is a bar in front of her house where people gamble and abuse the whole day. It is her constant fear that her husband and children might get influenced by the surroundings.

While trying to make improvements in her family life, Sarika has dreams for her community too. “I want to do something for the house wives in my community and around, just the way I was helped. I want to create a platform where there can share their issues and find solutions for their miseries. I want to get them closer to knowing and benefiting from IT”, shares an inspired Sarika.

“After joining PIF, I have earned a lot of respect in my community and the place where I work. Now people call me ma’am. I never thought this would ever happen in my life. I am so delighted and proud of myself today”, exclaims Sarika.


Saturday, 16 January 2016

अनुभवींचे मार्गदर्शन दिशादर्शक व मौल्यवान ठरले. - धीरज चौरसिया

Dhiraj Chaursiya

एका तरुणाने लहानपणी पायलट व्हायचे ठरवले होते. मित्र खिल्ली उडवायचे कि, विमानाचा पायलट होणार की, गाडी चालवायचा...पण कधी त्याला स्वत:लाही वाटले नव्हते, कि हा तरुण हवेतून जमिनीवर येऊन आधुनिक तंत्रज्ञानाच्या संगणकाचे क्ष-किरण तपासणारा अभियंता होईल ते! हार्डवेअर इंजिनीअरचा पल्ला गाठणाऱ्या त्या तरुणाचा घेतलेला मागोवा...  

धीरजचा जन्म आणि वास्तव्य मुंबईचे. त्याच्या आजोबांचा खायची पाने विकण्याचा व्यवसाय  होता. धीरजच्या वडिलांचे आजोबांशी न पटल्यामुळे त्यांनी वेगळं होण्याचा निर्णय घेतला. टाटा नगरी - मानखुर्द - गोवंडी असा वास्तव्याच्या चकरा धीरजच्या वडिलांनी केल्या. गोवंडीला वडिलांचा व्यासाय म्हणजेच पानाची गादी व्यवस्थित सुरु होती. घरी आई-वडिल, धीरज आणि दोन लहान बहिणी.

मुलांच्या शिक्षणासाठी धीरजच्या वडिलांनी वाशी नाक्याला राहण्याचा निर्णय घेतला. धीरजचा शाळेत इंग्रजी माध्यमात प्रवेश झाल्यानंतर दोन बहिणींनाही त्याच शाळेत घालण्यात आले.  शाळेत धीरज शिक्षकांचा लाडका आणि  अभ्यासात हुशार होता. पहिली ते आठवीपर्यंत वर्गात दुसरा किंवा तिसरा येणारा धीरज. पण नववी आणि दहावीमध्ये त्याच्या अभ्यासात अधोगती येत गेली; कारण त्याला वेगळ्या मित्रांची संगत लागली आणि तो वाहवत गेला. वडिल आणि शिक्षकांनी धीरजला समजावले. परंतू तो ऐकण्याच्या मन:स्थितीत नव्हता. वडिलांनी त्याला दहावी पूर्ण करुन स्वत:चा निर्णय घेण्यास सांगितला.

अशातच महानगरपालिकेच्या कर्मचाऱ्यांनी पानाची गादी तोडली. त्यावरच घरचे अर्थकारण अवलंबून होते. त्यामुळे शाळेचे शुल्क भरण्यासही उशीर झाला. घरातही अडी-अडचणी सुरु झाल्या. त्यानंतर वडिलांनी एक टेबल आणून त्यावर पानाची गादी सुरु केली.  धीरज दहावी उत्तीर्ण होणार नाही, अशी त्याला स्वत:ला खात्री होती. परंतू तो उत्तीर्ण झाला.

वडिलांनी धीरजला कौटुंबिक व्यवसायात येण्यास सांगितले. तेव्हा  त्याने एकाच ठिकाणी व्यवसाय करण्यापेक्षा दोन स्वतंत्र ठिकाणी दुकाने असल्यास योग्य होईल, असे मत वडिलांसमोर ठेवले. पांजरपोळ सर्कलला वडिलांच्या मदतीने धीरजने दुकान घेतले. तेव्हा  ५६० /- रुपये पहिली कमाई घरी आणल्याचे धीरज सांगतो.

धीरजचे वडिल आणि त्यांचे जुने मित्र यांची चर्चा सुरु असताना धीरजबाबत विषय निघाला. वडिलांच्या मित्राने धीरजला एका व्यक्तीस भेटायला सांगितले. धीरज जेव्हा त्यांना भेटला. तेव्हा त्यांनी धीरजला विचारले, ‘तुला पुढे काय करायचे आहे ? काम करायचे आहे, शिकायचे आहे की काम करुन शिकायचे आहे.’ काम करुनही शिकता येते, हे धीरजला तेव्हा कळाले. त्या व्यक्तीने धीरजला स्वत:चा अनुभव सांगून योग्य मार्गदर्शन केले.

त्या व्यक्तीच्या संदर्भाने २००६ ला धीरज संचार पीसी सोल्युशनला  ‘ऑफिस असिस्टंट’ म्हणून नोकरीला लागला. कार्यालयीन कामाचा अनुभव नसल्याने वरिष्ठ सांगतील ती कामे धीरज करायचा. कालांतराने टिळक नगर ऑफिसमध्ये धीरजला ‘पिक टॉक’ प्रकल्पात काम करण्याची संधी मिळाली. पिक टॉक मशीनची बॅटरी व  काटरेज तपासणे,  कंटेंट ट्रान्सफर करण्याची प्रक्रिया, इ. काम धीरजकडे होते. हार्डवेअरच्या विभागातील सहकाऱ्यांशी ओळख करुन ते काम पाहून शिकण्याचे मार्गदर्शन वरिष्ठांनी केले.  काम करत असताना रात्रीच्या महाविद्यालयाने त्याने शिक्षण पूर्ण केले. त्याने पदवीपर्यंतचे शिक्षण वाणिज्य शाखेतून केले. त्यानंतर सर्टिफाइड सिस्को नेटवर्क अॅडमिनीस्ट्रेटरचा कोर्सही धीरजने केला. 

हार्डवेअरच्या विभागात धीरज कम्प्युटरच्या वेगवेगळ्या भागांवर काम करत. मदरबोर्ड, सी.पी.यु. आदी पार्टस् संबधित काम करताना अनुभवी सहकाऱ्यांचे मार्गदर्शन धीरजला मिळाले. कम्प्युटरच्या विविध पार्टस् आणि त्यांची माहिती इंजिनीअरकडून धीरजने जाणून घेतली. हार्डवेअरचे ज्ञान त्याने संबंधित पुस्तकातून घेतले. फिल्डचा अनुभव धीरजला खूप काही शिकवून गेला. नवीन समस्या आणि त्यावर उपाय या अनुभवातून  धीरजने  शिकत प्रगती केली.

कामाची धडाडी पाहून २०१० ला एज्युकेशन फॉर ऑल प्रकल्पामध्ये हार्डवेअरची जबाबदारी धीरजला देण्यात आली. त्यासाठी मुंबईला कम्प्युटर संदर्भातील समस्या निवारण्यासाठी कॉल  सेंटर तयार केले. दहा ते बारा राज्यात हा प्रकल्प सुरु असल्यामुळे २०११-१२ ला हैद्राबाद, लखनौ, विशाखापट्टणम, दिल्ली, राजस्थान अशा विविध राज्यात धीरजचे कामानिमित्त जाणे झाले. लोकांशी संवाद, समस्या व त्यावर उपाय, प्रशिक्षण इ. बाबींचा अनुभव धीरजच्या विकासासाठी सकारात्मक राहिला. २०१२ ला वरिष्ठांच्या मार्गदर्शनाखाली हार्डवेअर विभागाचे दायित्व धीरजने स्वीकारले. धीरजसोबत २१ जणांची टीम असून महाराष्ट्रासह अन्य राज्यात ४००  केंद्रांमध्ये काम सुरु आहे. तसेच तीसहून जास्त  इतर क्लाईंट आहेत. 

‘आयुष्यात जे चढ-उतार आले, त्यातून शिकत-शिकत जीवनात स्थैर्य निर्माण करता आले. आर्थिक स्तर व्यवस्थित असून दोन्ही बहिणीचे शिक्षण योग्य पद्धतीने सुरु आहे.’ अशा भावना धीरजने व्यक्त केल्या. ३ एप्रिल २०१४ ला धीरजचा प्रेमविवाह झाला. धीरजची जोडीदार ‘करुणा’ समजूतदार आणि कौटुंबिक स्वास्थ्य टिकवून ठेवणारी आहे, असे धीरज आवर्जून सांगतो.                                                     
धीरज ऑफिस असिस्टंट ते हार्डवेअर इंजिनीअर या प्रवासात आत्मविश्वास, संवादकौशल्य, स्वत:च्या व्यक्तिमत्वाचे सादरीकरण ही महत्वाची कौशल्ये शिकला. “तुमने किसी का गलत नही किया ना, तो तुम्हारा भी कुछ गलत नही होगा. जिंदगी में सच्चे बनके चलो और किसी का बुरा मत चाहो !” हे आई-वडिलांचे तत्व धीरज अमलात आणतो आणि त्या उद्देशानेच मार्गक्रमणा करतो.